प्रकृति और संस्कृति का समन्वय है आठ दिवसीय राजगीर मकर मेला

नालंदा दर्पण डेस्क। जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति होती है। मकर संक्रांति सनातनी परंपरा में भगवान सूर्य को समर्पित है। यह आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होने लगते हैं। दिन बड़ा और रात छोटी होने लगती है।

मकर संक्रांति के मौके पर पंच पहाड़ियों और गर्म जल के झरनों के लिए मशहूर राजगीर में 14 जनवरी से आठ दिवसीय राजकीय मकर मेला का भव्य आयोजन किया जाता है।

इस मेले में दूर-दूर और दूसरे जिलों से लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का समागम होता है। लोग राजगीर के पवित्र गर्म जल के झरनों- कुंडों में मकर संक्रांति स्नान करते हैं। मेले में कई तरह के सामान सस्ते दामों पर मिलते हैं।

प्रकृति और परंपरा से जुड़े इस मेले में लोक- संस्कृति और लोक गीत-संगीत को करीब से महसूस किया जाता है। प्रकृति में विद्यमान शाश्वत संगीत और उसके लय की अनुभूति के लिए लोग राजगीर के मकर मेले आते हैं। यह मगध का सबसे विशाल परंपरागत मेला माना जाता है। यहां लाखों की संख्या में नर नारी, बाल- वृद्ध, युवक- युवतियां मकर स्नान और सैर सपाटे के लिए आते हैं।

ऐसे तो मेला अवधि में हर दिन हजारों लोग गर्म जल के झरनों और कुंडों में स्नान करते हैं, लेकिन 14-15 जनवरी को लाखों की संख्या में लोग एकत्रित होकर गर्म जल के कुंडों में पुण्य स्नान करते हैं। स्नान के बाद लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजा अर्चना और दान पुण्य करते हैं। उसके बाद पारंपरिक भोजन चूड़ा, दही, तिलकुट, खाजा, गुड़, आलू-फुलगोभी की सब्जियों का सेवन करते हैं।

पहले परिजनों से मिलने का माध्यम था मेला: राजगीर का मकर मेला सांकृतिक, प्राकृतिक, अध्यात्मिक और पारंपरिक पृष्ठभूमि का संवाहक है। पहले जब आवागमन के साधन सुलभ नहीं थे, तब मगध क्षेत्र और आस-पास के जिलों के लोग पैदल और बैलगाड़ी से मकर संक्रांति स्नान के लिए आते थे।

स्नानार्थी मकर स्नान के लिए पेड़ों के नीचे डेरा डालते थे। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग गर्म जल के झरनों- कुंडों में स्नान और रिश्तेदारों से मिलने की लालसा में पैदल रास्ता आते थे। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि पहले कई दिनों तक चलने के बाद राजगीर पहुंचते थे।

कुंडों में स्नान करने और परिजनों से मुलाकात बाद उनकी सारी थकावट दूर हो जाती थी। पहले मेला परिवारों से मिलने जुलने का प्रमुख केंद्र होता था। मां-बेटी, सास बहू, ननद- भौजाई, फूआ- मौसी मेले में आते और एक दूसरे से मुलाकात कर आह्लादित होते थे।

बुजुर्ग बताते हैं कि आज भी याद है उस समय मेले की रातें किस तरह समां बांधते थे। रोशनी के लिए लालटेन, दिबरी, पेट्रोमेक्स जलाते थे। कांपती सर्द रातों में अलाव जलते थे। लेकिन अब आधुनिकता की दौड़ में मेला का स्वरूप बदल गया है। आवागमन के सुलभ साधन से भी पुरानी परंपराएं कुंद पड़ गयी हैं।

मकर मेले में दिखती है मगध की आन-बान-शानः राजगीर का मकर मेला समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। इस मेले में मगध का आन- बान-शान परिलक्षित होता है। मेला में मगध की सांझी विरासत का अदभुत समन्वय झलकता है। झरनों की कल-कल धारा, पक्षियों की कलरव, चहचहाहट और नृत्य संगीत मनोहारी होती है। मेला विविधता से भरा पूरा होता है।

एक ओर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य-संगीत का मनभावन प्रदर्शन होता है, तो दूसरी ओर बच्चों का क्विज, वाद-विवाद प्रतियोगिता होती है। फुटबॉल, क्रिकेट, वॉलीबॉल, कबड्डी, दंगल, एथलेटिक्स आदि खेल-कूद प्रतियोगिताओं के साथ व्यंजन मेला, मनोरंजन, दुधारू पशु प्रदर्शनी, किसानों के उत्पादों की प्रदर्शनी आदि के स्टॉल होते हैं।

सरकार की विभिन्न योजनाओं से रूबरू कराने के उद्देश्य से विभागीय प्रदर्शनी लगाये जाते हैं। किसानों को आधुनिक तकनीक से अवगत कराने के लिए कृषि, आत्मा, उद्यान, मत्स्य, गव्य, पशुपालन पदाधिकारियों द्वारा प्रत्यक्षण कराया जाता है।

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