हिलसा में रेल विकास की कहानी: सपनों की पटरी पर दौड़ता उम्मीदों का सफर
हिलसा और डियावां जैसे क्षेत्रों की रेल कहानी विकास और उपेक्षा की दोरंगी तस्वीर है। एक तरफ राज्य सरकार की कोशिशें हैं, जिन्होंने रेल सेवाओं का विस्तार किया तो दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत है- जहां अधूरी परियोजनाएं, जर्जर प्लेटफार्म और सुविधाहीन हॉल्ट यात्रियों की परेशानी का सबब बने हुए हैं...
हिलसा (नालंदा दर्पण)। आज़ादी के बाद से अब तक हिलसा अनुमंडल ने विकास की कई परतें देखीं हैं, लेकिन जब बात होती है आधारभूत संरचना और विशेषकर रेल सुविधा की तो यह क्षेत्र न केवल ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे है, बल्कि रेल विकास की लंबी, संघर्षपूर्ण और प्रेरक गाथा भी कहता है।
हिलसा और इसके आसपास के क्षेत्रों में असली रेल विकास तब नज़र आया, जब नीतीश कुमार वर्ष 2001 से 2004 तक केंद्र में रेल मंत्री बने और बाद में 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में नालंदा जिले को छह नई रेल परियोजनाएं मिलीं, जिनमें फतुहा-इस्लामपुर और इस्लामपुर-नटेसर रेलखंड उनके ड्रीम प्रोजेक्ट माने जाते हैं।
22 जनवरी 2003 को फतुहा-इस्लामपुर रेलखंड का उद्घाटन किया गया, जिसमें तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस भी मौजूद रहे। वहीं इस्लामपुर से नटेसर रेलखंड पर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाकर सेवा शुरू की। इन परियोजनाओं ने नालंदा के ग्रामीण अंचल को देश के कई प्रमुख शहरों से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है।
हिलसा स्टेशन की अधूरी उम्मीदः हालांकि हिलसा रेलवे स्टेशन पर प्लेटफॉर्म की ऊंचाई और लंबाई आज भी चिंता का विषय है। यात्री खासकर महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और दिव्यांगों को चढ़ने-उतरने में भारी परेशानी होती है। कई बार लोग गिरकर चोटिल हो जाते हैं, और गंभीर दुर्घटनाओं की खबरें भी सामने आई हैं।
स्थानीय सामाजिक संगठनों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर स्टेशन को बेहतर बनाने की मांग की है। हिलसा स्टेशन से हर दिन हजारों लोग यात्रा करते हैं, लेकिन प्लेटफार्म की ऊंचाई कम और ओवरब्रिज की अनुपस्थिति के कारण ट्रेनें ट्रैक पर घंटों खड़ी रहती हैं। यात्रियों को ट्रेन के नीचे से होकर पार करना पड़ता है, जिससे जान का खतरा बना रहता है।
डियावां हॉल्ट, एक भुला दिया गया स्टेशनः करायपरशुराय प्रखंड में स्थित डियावां स्टेशन, जो कभी मार्टिन कम्पनी द्वारा बनाए गए फतुहा-इस्लामपुर लाइट रेललाइन का गौरवशाली हिस्सा था, आज सुविधाहीन हॉल्ट बनकर रह गया है। अंग्रेज़ी शासन में बना यह स्टेशन एक समय सभी ट्रेनों का मेल बिंदु हुआ करता था, लेकिन आज यहां न पानी है, न शौचालय, न बिजली और न यात्री शेड।
हाल ही में इस्लामपुर-हटिया एक्सप्रेस का ठहराव डियावां हॉल्ट पर सांसद कौशलेंद्र कुमार की पहल से शुरू हुआ, जिससे आसपास के 120 गांवों के किसान, दूध विक्रेता और दैनिक यात्री लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन हॉल्ट की स्थिति में कोई बड़ा सुधार अब तक नहीं हुआ है।
इतिहास की गवाही देते खंडहरः 1922 में बनी यह रेल सेवा 1976 की भयावह बाढ़ में तहस-नहस हो गई थी। तब मार्टिन कम्पनी द्वारा संचालित रेलवे की पटरी और स्टेशन बर्बाद हो गए थे। वर्ष 2001 में रेल मंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने इस सेवा को फिर से शुरू करवाया, लेकिन डियावां जैसे स्टेशन का पुनर्विकास आज तक अधूरा है।
हिलसा और डियावां जैसे क्षेत्रों की रेल कहानी विकास और उपेक्षा की दोरंगी तस्वीर है। एक तरफ राज्य सरकार की कोशिशें हैं, जिन्होंने रेल सेवाओं का विस्तार किया तो दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत है- जहां अधूरी परियोजनाएं, जर्जर प्लेटफार्म और सुविधाहीन हॉल्ट यात्रियों की परेशानी का सबब बने हुए हैं।
अब ज़रूरत है कि रेल विभाग इन पुराने लेकिन ज़रूरी स्टेशनों को फिर से जीवंत बनाए और हिलसा अनुमंडल को वह सुविधा दे, जिसकी वह वर्षों से हकदार है। क्योंकि सुविधाएं घट रही हैं, जबकि यात्री संख्या और रेलवे की आमदनी बढ़ रही है।





