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बिहार विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण SIR की भ्रांतियों का तथ्यपरक विश्लेषण

नालंदा दर्पण डेस्क/ मुकेश भारतीय। बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा जारी विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) अभियान विवादों के केंद्र में है। इस प्रक्रिया को लेकर कई भ्रांतियाँ और आशंकाएँ जनमानस में फैल रही हैं।

कुछ इसे मतदाता सूची को दुरुस्त करने की सामान्य प्रक्रिया मान रहे हैं तो कुछ इसे नागरिकों के मताधिकार पर हमला बता रहे हैं। इस लेख में हम विभिन्न सूचना स्रोतों- जैसे समाचार पत्र, वेबसाइट्स और विशेषज्ञों के विचारों के आधार पर इस अभियान का तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करते हैं। ताकि बिहार विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण की भ्रांतियों का सच सामने आए।

यह सामान्य मतदाता सूची संशोधन है?

दावा: चुनाव आयोग बिहार की मतदाता सूची की नियमित छानबीन और संशोधन कर रहा है, जैसा कि पहले भी कई बार हो चुका है।

सच: यह दावा भ्रामक है। बिहार में अभी तक चल रही मतदाता सूची का संशोधन नहीं हो रहा, बल्कि पुरानी सूची को पूरी तरह खारिज कर नए सिरे से मतदाता सूची तैयार की जा रही है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची के कम्प्यूटरीकरण के बाद अभूतपूर्व है।

तथ्य: पिछले 22 वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि पूरी मतदाता सूची को रद्द कर नई सूची बनाई जा रही है। पहले मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की जिम्मेदारी बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) पर थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी व्यक्तिगत नागरिकों पर डाल दी गई है।

विश्लेषण: यह कदम जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत उठाया गया है, जो आयोग को विशेष संशोधन का अधिकार देता है। हालांकि इसकी समयसीमा और कार्यान्वयन की जटिलता इसे सामान्य प्रक्रिया से अलग करती है।

2003 की सूची में नाम होने वालों को कुछ नहीं करना होगा?

दावा: जिन मतदाताओं का नाम 2003 की मतदाता सूची में था, उन्हें कोई अतिरिक्त दस्तावेज या फॉर्म जमा करने की आवश्यकता नहीं है।

सच: यह आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी तरह नहीं। 2003 की सूची में नाम होने वालों को भी गणना फॉर्म (Enumeration Form) भरना अनिवार्य है।

तथ्य: ऐसे मतदाताओं को केवल जन्मतिथि और जन्मस्थान का प्रमाण देने से छूट मिलती है, लेकिन उन्हें फॉर्म के साथ 2003 की मतदाता सूची के अपने नाम वाले पेज की फोटोकॉपी, नवीनतम पासपोर्ट साइज फोटो और हस्ताक्षर जमा करने होंगे।

विश्लेषण: यह प्रक्रिया उन मतदाताओं के लिए भी बोझिल है जो दशकों से मतदान करते आ रहे हैं। विशेष रूप से ग्रामीण और प्रवासी मतदाताओं के लिए पुरानी सूची की फोटोकॉपी प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

केवल संदिग्ध नागरिकों से प्रमाणपत्र मांगे जा रहे हैं?

दावा: नागरिकता प्रमाणपत्र केवल उन लोगों से मांगा जा रहा है जिनकी नागरिकता पर शक है।

सच: यह पूरी तरह गलत है। 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले सभी मतदाताओं को नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने होंगे।

तथ्य: 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे व्यक्तियों को अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान का प्रमाण देना होगा। 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे व्यक्तियों को अपने और माता-पिता में से किसी एक का प्रमाणपत्र देना होगा। 2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्तियों को अपने और दोनों माता-पिता के प्रमाणपत्र जमा करने होंगे।

विश्लेषण: यह आवश्यकता अनुच्छेद 326 का उल्लंघन कर सकती है, जो वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। बिहार जैसे राज्य में, जहां गरीबी और पलायन का स्तर उच्च है, लाखों लोगों के पास ये दस्तावेज नहीं हो सकते।

पर्याप्त विकल्प दिए गए हैं, हर घर में कोई न कोई प्रमाणपत्र होगा?

दावा: चुनाव आयोग ने 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिसमें से कोई न कोई प्रमाणपत्र हर घर में उपलब्ध होगा।

सच: यह दावा भ्रामक है। आयोग द्वारा स्वीकृत 11 दस्तावेजों में कई ऐसे हैं जो बिहार की अधिकांश आबादी के पास नहीं हैं।

तथ्य: आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी और मनरेगा जॉब कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेज अमान्य हैं। स्वीकृत दस्तावेजों में जन्म प्रमाणपत्र (2.8%), पासपोर्ट (2.4%), सरकारी नौकरी/पेंशन आईडी (5%), और मैट्रिक प्रमाणपत्र (50% से कम) शामिल हैं। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) बिहार में लागू नहीं है। फिर भी इसे सूची में शामिल किया गया है।

विश्लेषण: बिहार में साक्षरता दर और दस्तावेजीकरण की कमी को देखते हुए यह प्रक्रिया विशेष रूप से गरीब, अशिक्षित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए प्रतिकूल है।

यह प्रक्रिया निष्पक्ष और समान है?

दावा: नियम सभी के लिए समान हैं, इसमें कोई भेदभाव नहीं है।

सच: सैद्धांतिक रूप से नियम समान हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है।

तथ्य: जिन लोगों को शिक्षा या आर्थिक अवसर नहीं मिले, जैसे महिलाएँ, दलित, आदिवासी और प्रवासी मजदूर, उनके पास आवश्यक दस्तावेज होने की संभावना कम है।

विश्लेषण: यह प्रक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को नागरिकता की शर्त बना देती है, जो संवैधानिक समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

तीन महीने का समय पर्याप्त है?

दावा: आयोग ने तीन महीने का समय दिया है, जिससे सभी का नाम सूची में शामिल हो जाएगा।

सच: वास्तव में प्रभावी समय केवल एक महीना (25 जुलाई 2025 तक) है।

तथ्य: 25 जुलाई तक फॉर्म जमा न करने वाले मतदाताओं का नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं होगा। शेष दो महीने आपत्ति निवारण और प्रशासनिक कार्यवाही के लिए हैं। बिहार में 77,000+ BLOs को प्रशिक्षित करना, फॉर्म वितरित करना और 7.9 करोड़ मतदाताओं से दस्तावेज एकत्र करना एक महीने में असंभव है।

विश्लेषण: यह समयसीमा अवास्तविक है और लाखों मतदाताओं को प्रक्रिया से बाहर कर सकती है।

यह अभियान अवैध घुसपैठियों को हटाएगा?

दावा: इस पुनरीक्षण से बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या समाप्त हो जाएगी।

सच: यह दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है।

तथ्य: बिहार में अवैध प्रवासियों की समस्या मुख्य रूप से नेपाली नागरिकों की है, जो अधिकांश हिंदू हैं, न कि बांग्लादेशी मुसलमानों की। इस प्रक्रिया से कुछ हजार अवैध प्रवासियों के नाम कट सकते हैं, लेकिन इसके साथ ही लगभग 2.5 करोड़ भारतीय नागरिकों का नाम भी कटने का खतरा है।

विश्लेषण: यह अभियान अवैध प्रवासियों से अधिक भारतीय नागरिकों, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों को प्रभावित करेगा।

विपक्ष और विशेषज्ञों की चिंताएं?

विपक्ष का रुख: कांग्रेस, राजद, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को वोटबंदी और लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। तेजस्वी यादव ने इसे गरीब और वंचित समुदायों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश बताया।

कानूनी चुनौती: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस आदेश को असंवैधानिक बताया है।

विशेषज्ञों की राय: सामाजिक कार्यकर्ता और विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इसे चुनावी जनगणना करार देते हुए चेतावनी दी कि यह करोड़ों नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर सकती है।

अब सच पूछिए तो बिहार विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण 2025 एक जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया है, जो सतह पर मतदाता सूची को शुद्ध करने का प्रयास दिखती है। लेकिन इसके पीछे कई गंभीर सवाल हैं। इसकी समयसीमा, दस्तावेजों की सख्ती और कार्यान्वयन की चुनौतियाँ इसे सामान्य पुनरीक्षण से अलग करती हैं।

यह प्रक्रिया बिहार की 8 करोड़ वयस्क आबादी में से लगभग 2.5 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर सकती है, विशेष रूप से गरीब, अशिक्षित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को।

चुनाव आयोग ने हाल ही में दस्तावेजों की अनिवार्यता को लचीला करने की घोषणा की है। जिसमें स्थानीय जांच और शपथ-पत्र को स्वीकार करने की बात कही गई है। यह कदम स्वागतयोग्य है। लेकिन इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता से लागू किया जाता है।

सुझाव: आयोग को आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे सामान्य दस्तावेजों को स्वीकार करना चाहिए। समयसीमा को बढ़ाकर कम से कम तीन महीने करना चाहिए। ताकि सभी पात्र मतदाता प्रक्रिया में शामिल हो सकें। ग्रामीण और प्रवासी मतदाताओं के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।

बहरहाल, बिहार की जनता को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और अपने मताधिकार की रक्षा के लिए समय पर फॉर्म जमा करना चाहिए। साथ ही आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह अभियान लोकतंत्र को मजबूत करे, न कि कमजोर।

Nalanda Darpan

नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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