
हिलसा (नालंदा दर्पण)। प्रकृति का रौद्र रूप कभी विनाश लाता है तो कभी अवसरों की सौगात। नालंदा जिले की लोकायन नदी कुछ दिन पहले बाढ़ के कारण तबाही का पर्याय बनी थी। लेकिन अब स्थानीय लोगों के लिए आशा की किरण बनकर उभरी है।
हाल ही में इस नदी में आई बाढ़ और झारखंड से छोड़े गए पानी ने खेतों को जलमग्न कर दिया था। गांवों में पानी घुस गया। फसलें बर्बाद हो गईं और लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। लेकिन अब जब पानी का स्तर घट रहा है, यही नदी लोगों के लिए आजीविका और उम्मीद का स्रोत बन गई है।
लोकायन नदी के किनारे इन दिनों एक अनोखा मेला सा लगा है। यह न तो कोई स्नान का आयोजन है, न ही तैराकी प्रतियोगिता। यहाँ का दृश्य है मछलियों की तलाश में जुटे सैकड़ों लोगों का।
सुबह से लेकर शाम तक नदी के किनारे ग्रामीणों की भीड़ देखने को मिल रही है। लोग सरका, मच्छरदानी, वंशी और जल जैसे पारंपरिक साधनों का उपयोग कर मछलियां पकड़ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले आठ दिनों से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। हर दिन लाखों रुपये की मछलियां नदी से निकाली जा रही हैं।
लोकायन नदी से पकड़ी गई मछलियां न केवल स्थानीय परिवारों के भोजन का साधन बन रही हैं, बल्कि कई लोगों के लिए आय का जरिया भी बन गई हैं। कुछ लोग इन मछलियों को अपने परिवार के लिए घर ले जा रहे हैं, जिससे उनके रसोई का खर्च कम हो रहा है।
वहीं कई लोग इन्हें स्थानीय बाजारों में बेचकर अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं। हिलसा के बाजारों में मछलियों की मांग हमेशा से रही है और इस समय नदी से मिल रही ताजा मछलियां व्यापारियों और ग्राहकों दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं।
कुछ ही हफ्ते पहले तक लोकायन नदी का उफान लोगों के लिए मुसीबत का सबब था। खेतों में पानी भरने से धान और अन्य फसलों को भारी नुकसान हुआ। कई गांवों में पानी घुसने से लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा।
लेकिन अब वही नदी लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। मछलियों की प्रचुरता ने न केवल आर्थिक संकट को कम किया है, बल्कि ग्रामीणों में एक नई उम्मीद भी जगाई है।
हालांकि इस अवसर के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। मछलियों के अंधाधुंध शिकार से नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मछलियों के प्रजनन और उनके प्राकृतिक चक्र को बनाए रखने के लिए संतुलित तरीके से मछली पकड़ना जरूरी है।
इसके अलावा नदी में लगातार लोगों की भीड़ से सुरक्षा और स्वच्छता के मुद्दे भी उठ रहे हैं। स्थानीय प्रशासन को इस दिशा में उचित कदम उठाने की जरूरत है, ताकि यह अवसर दीर्घकालिक लाभ दे सके।
बहरहाल लोकायन नदी की यह कहानी प्रकृति के दोहरे चरित्र को दर्शाती है। एक ओर यह विनाशकारी हो सकती है तो दूसरी ओर जीवनदायिनी। बाढ़ के बाद का यह दृश्य न केवल स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक अवसर लाया है, बल्कि यह भी दिखाता है कि विपत्ति में भी अवसर छिपे होते हैं।







