प्रसुता-दिव्यांग मरीज संग 40 मिनट तक लिफ्ट में फंसे सिविल सर्जन!

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहारशरीफ मॉडल हॉस्पिटल (सदर अस्पताल) में करोड़ों रुपये की लागत से बुनियादी सुविधाओं का ढांचा तैयार किया गया, लेकिन मरीज के लिए एक विश्वसनीय लिफ्ट तक उपलब्ध नहीं हो सकी। अस्पताल में तीन अलग-अलग क्षमता वाली लिफ्टें स्थापित की गई हैं, लेकिन इनका नियमित संचालन एक दूर का सपना बना हुआ है। स्थिति इतनी बदतर है कि यदि महीने में 10 दिन भी लिफ्ट सुचारू रूप से चल जाए तो इसे मरीजों के लिए सौभाग्य माना जाता है।
लिफ्ट की खराबी के कारण आए दिन मरीज और उनके परिजन परेशान होते हैं। तकनीशियन बुलाए जाते हैं, मरम्मत होती है, लेकिन दो-तीन दिन बाद लिफ्ट फिर से ठप हो जाती है। इस बार तो हद ही हो गई, जब सिविल सर्जन (सीएस) और जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) स्वयं इस समस्या का शिकार हो गए।
घटना उस समय की है, जब सिविल सर्जन और डीपीएम चौथी मंजिल पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेकर लौट रहे थे। उनके साथ एक गर्भवती महिला (प्रसुता) और दो दिव्यांग मरीज भी लिफ्ट में सवार थे, जो तीसरी मंजिल से चढ़े थे। अचानक लिफ्ट बीच में रुक गई और करीब 40 मिनट तक सभी उसमें फंसे रहे। इस दौरान न तो कोई तकनीकी सहायता तुरंत उपलब्ध हो सकी और न ही अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई त्वरित कार्रवाई की गई।
लिफ्ट में फंसे लोगों में घबराहट और बेचैनी बढ़ने लगी। खासकर गर्भवती महिला और दिव्यांग मरीजों की स्थिति को देखते हुए माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया। काफी मशक्कत और रुक-रुककर चलने के बाद लिफ्ट अंततः नीचे पहुंची और सभी लोग सुरक्षित बाहर निकल सके।
इस घटना से नाराज सिविल सर्जन ने अस्पताल प्रबंधन एजेंसी की लापरवाही को गंभीरता से लिया। उन्होंने तुरंत स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर इस मामले की पूरी जानकारी दी और दोषी एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। सिविल सर्जन ने अपने पत्र में लिखा कि यह अत्यंत शर्मनाक है कि इतने बड़े अस्पताल में लिफ्ट जैसी बुनियादी सुविधा भी विश्वसनीय नहीं है। मरीजों और उनके परिजनों को बार-बार इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है, जो स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब मॉडल हॉस्पिटल की लिफ्ट में लोग फंसने की घटना सामने आई हो। बताया जाता है कि लिफ्ट की खराबी अब एक आम समस्या बन चुकी है। खासकर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग मरीजों के लिए यह स्थिति बेहद जोखिम भरी है।
अस्पताल प्रबंधन की ओर से इस मामले पर कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। सूत्रों के अनुसार लिफ्ट की मरम्मत के लिए रखरखाव एजेंसी को बार-बार सूचित किया जाता है, लेकिन उनकी ओर से केवल अस्थायी समाधान ही पेश किया जाता है। तकनीशियन द्वारा मरम्मत के बाद लिफ्ट कुछ दिनों तक चलती है, लेकिन फिर वही समस्या दोहराई जाती है।
इस घटना ने एक बार फिर मॉडल हॉस्पिटल के प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लिफ्ट की नियमित रखरखाव और गुणवत्ता जांच के लिए एक स्थायी तंत्र स्थापित करना जरूरी है। साथ ही अस्पताल प्रबंधन को चाहिए कि वह ऐसी एजेंसियों के साथ अनुबंध करे जो समय पर और प्रभावी ढंग से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकें।







