
हिलसा (नालंदा दर्पण)। हिलसा विधानसभा सीट बिहार की राजनीति का वह जीवंत दर्पण है, जो हर दशक में बदलते समीकरणों, नए चेहरों और अनूठी कहानियों को दर्शाता है। इस क्षेत्र की जनता ने बार-बार साबित किया है कि लोकतंत्र की असली ताकत उनके हाथ में है। कभी कांग्रेस को सिरमौर बनाने वाली हिलसा की जनता ने जनसंघ को मौका दिया तो कभी महज 12 वोटों के अंतर से सत्ता का रुख मोड़ दिया। 1957 में कांग्रेस के लाल सिंह त्यागी से शुरू हुआ यह सियासी सफर कई बार करवट ले चुका है और आज यह क्षेत्र जदयू बनाम राजद की जोरदार टक्कर का गवाह है।
हिलसा की राजनीति का सफर 1957 में शुरू हुआ, जब कांग्रेस के लाल सिंह त्यागी ने पहली जीत दर्ज की। उस दौर में कांग्रेस का बिहार में दबदबा था और हिलसा उसका मजबूत गढ़ था। लेकिन 1962 में हवा बदली और भारतीय जनसंघ के जगदीश प्रसाद ने कांग्रेस को पछाड़कर बाजी मारी। 1967 में कांग्रेस ने वापसी की, लेकिन 1969 में जनसंघ ने फिर कब्जा जमाया।
1977 में जनता पार्टी की लहर ने हिलसा को भी प्रभावित किया और जगदीश प्रसाद इस बार जनता पार्टी के टिकट पर विजयी रहे। 1980 में वही नेता भाजपा के झंडे तले जीते, जो हिलसा की सियासत में निरंतरता और बदलाव का प्रतीक बने।
1985 में कांग्रेस के सुरेंद्र प्रसाद तरुण ने जीत हासिल की, लेकिन 1990 का चुनाव हिलसा के लिए ऐतिहासिक रहा। इस बार मतदाताओं ने इंडियन पीपुल्स फ्रंट के कृष्णदेव सिंह यादव को चुना, जो वामपंथ की ताकत और जनता की बदलाव की चाहत का प्रतीक था।
2000 के बाद हिलसा में जदयू ने अपनी पकड़ मजबूत की। 2005 के दोनों चुनावों में रामचरित्र प्रसाद सिंह ने जदयू के टिकट पर लगातार जीत दर्ज की। 2010 का चुनाव खास रहा, क्योंकि इसमें दो महिला उम्मीदवारों जदयू की उषा सिन्हा और लोजपा की रीना देवी के बीच मुकाबला हुआ। उषा सिन्हा ने 7400 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जो न केवल जदयू की मजबूती को दर्शाता था, बल्कि हिलसा में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक भी बना।
2015 में हिलसा ने एक बार फिर करवट बदली। राजद के शक्ति सिंह यादव ने जदयू को कड़ी टक्कर देकर 26,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। कुल 1,49,493 मतदाताओं में से 72,347 ने राजद को वोट दिया। यह जीत राजद की शक्तिशाली वापसी और शक्ति सिंह की लोकप्रियता का प्रतीक बनी।
2020 का बिहार विधानसभा चुनाव हिलसा के लिए सबसे रोमांचक रहा। जदयू के कृष्णमुरारी शरण और राजद के शक्ति सिंह यादव के बीच मुकाबला इतना कांटे का था कि नतीजा महज 12 वोटों के अंतर से तय हुआ। कृष्णमुरारी शरण ने 61,848 वोटों के साथ जीत हासिल की, जबकि अत्रि मुनी को 61,836 वोट मिले। कुल 1,65,580 मतदाताओं ने वोट डाले, जो 54.79 प्रतिशत मतदान था। यह नतीजा बिहार के चुनावी इतिहास में सबसे कम अंतर वाली जीत के रूप में दर्ज हुआ और हिलसा को पूरे राज्य में चर्चा का केंद्र बना दिया।
हिलसा विधानसभा क्षेत्र में हिलसा, करायपरसुराय, थरथरी और परबलपुर प्रखंड शामिल हैं, जिनमें 64 ग्राम पंचायतें हैं। यह क्षेत्र ग्रामीण संस्कृति और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का प्रतीक है, जहां 82 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है। बाढ़ और सूखा यहां के किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।
झारखंड से अचानक छोड़ा गया पानी बाढ़ का कारण बनता है, जबकि नदियों में पानी की कमी या कम बारिश फसलों को बर्बाद करती है। इसके अलावा भ्रष्टाचार और अफसरशाही भी प्रमुख मुद्दे हैं, जो हर चुनाव में बहस का केंद्र बनते हैं।
हिलसा की जनता ने बार-बार साबित किया है कि यहां कोई स्थायी विजेता नहीं है। वे न तो किसी पार्टी पर स्थायी भरोसा करते हैं, न ही किसी नेता को स्थायी सत्ता सौंपते हैं। उनकी पसंद नेतृत्व और मुद्दों पर आधारित होती है। चाहे वह 1962 में जनसंघ की जीत हो, 1990 में वामपंथ का उभार हो या 2020 में 12 वोटों का रोमांचक नतीजा। हिलसा की सियासत हमेशा अप्रत्याशित और जीवंत रही है।
हिलसा की यह कहानी बिहार की राजनीति का एक अनूठा अध्याय है, जो यह सिखाती है कि लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सर्वोपरि है। लगता है कि हिलसा एक बार फिर अपनी सियासी ताकत और संवेदनशीलता के साथ बिहार के रणक्षेत्र में चर्चा का केंद्र बनेगा।





