
राजगीर (नालंदा दर्पण)। मगध की प्राचीन नगरी राजगीर, जहां कभी भगवान बुद्ध ने गिद्धकूट पर्वत पर उपदेश दिए, महावीर स्वामी ने जैन धर्म का प्रचार किया और पांडवों ने वनवास काटा, आज भी अपनी प्राकृतिक और आध्यात्मिक रहस्यमयीता से दुनिया को लुभाती है। लेकिन इस ऐतिहासिक शहर की धमनियों में बहने वाली गर्मजल की पवित्र धाराएं, जिन्हें आदि काल से 22 कुंड और 52 धाराओं के रूप में जाना जाता है, आज उपेक्षा की भेंट चढ़ रही हैं।

हाल ही समाप्त हुए विधानसभा चुनावों में जाति-धर्म, नौकरी-आरक्षण और विकास की बहसें गूंजीं, लेकिन राजगीर के इन पौराणिक कुंडों और भेलवडोभ जलाशय के संकट पर कोई प्रत्याशी ने मुंह नहीं खोला। यह न केवल सांस्कृतिक लापरवाही है, बल्कि उन किवदंतियों, लोक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं का भी अपमान है, जो इन्हें अमर बनाती हैं।
यदि समय रहते ध्यान न दिया गया तो 2026 में लगने वाले राजकीय मलमास मेले पर गहरा संकट मंडरा सकता है। आइए, इस धरोहर की गहराई में उतरें,जहां इतिहास, मिथक और प्रकृति का अनोखा संगम है।
राजगीर के गर्मजल कुंड कोई साधारण जलस्रोत नहीं हैं; ये तो आदि पुराणों की अमृत बूंदें हैं, जो पृथ्वी की गर्भ से निकलकर आध्यात्मिक ऊर्जा बांटती हैं। प्राचीन ग्रंथों और लोक कथाओं में इनका उल्लेख मिलता है, जहां इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव की कृपा का प्रतीक माना गया है। सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मकुंड जिसे सप्तधारा या सप्तर्षि कुंड भी कहा जाता है, हिंदू मान्यताओं में ब्रह्मा देव के आशीर्वाद से जुड़ा है।
कथा प्रचलित है कि सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा ने यहां सात ऋषियों वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज के तपस्या स्थल पर आशीर्वाद दिया। ये सात ऋषि, जो सप्तर्षि मंडल के रूप में आकाश में चमकते हैं, उन्होंने अपनी तपस्या से पृथ्वी को रोगों से मुक्त करने के लिए ये धाराएं उत्पन्न कीं।
लोक कथा के अनुसार इन सात धाराओं का संगम ब्रह्मकुंड में होता है, जहां स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और रोग नष्ट हो जाते हैं। महाभारत की कथाओं में तो इन्हें पांडवों से जोड़ा जाता है। वनवास के दौरान अर्जुन ने इन्हीं कुंडों में स्नान कर अपनी थकान मिटाई थी और युधिष्ठिर ने इन्हें ‘दुखहरणी’ कहा था। आज भी ब्रह्मकुंड का पानी 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म रहता है, जो वैज्ञानिक रूप से जियोथर्मल ऊर्जा का चमत्कार है, लेकिन धार्मिक रूप से तो ये ब्रह्मा की सृष्टि रस की धारा है।
इसी क्रम में अग्निधारा कुंड की कथा और भी रोचक है। जैन और हिंदू लोक कथाओं में इसे अग्नि देव की ज्वाला से जोड़ा जाता है। किवदंती है कि जब राजा जरासंध ने भगवान कृष्ण पर आक्रमण किया तो कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से पर्वत को चीर दिया और वहां से निकली अग्नि की धारा ने शत्रुओं को भस्म कर दिया।
लेकिन युद्ध समाप्ति पर यह धारा औषधीय जल में परिवर्तित हो गई, जो त्वचा रोगों और पुरानी व्याधियों को जड़ से मिटाती है। स्थानीय लोक गाथाओं में गाए जाते हैं। ‘अग्नि बनी अमृत धरती की गोद में बहती’, जो राजगीर की युद्ध-शांति की द्वंद्वात्मकता को दर्शाती है।
इसी प्रकार गोदावरी कुंड को दक्षिण की पवित्र गोदावरी नदी का उत्तरी रूप माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि ऋषि विश्वामित्र ने अपनी तपस्या से गंगा-यमुना के साथ गोदावरी को भी मगध की भूमि पर उतारा। ताकि मगधवासी बिना दक्षिण जाए पवित्र स्नान कर सकें। यह कुंड आज सूखने की कगार पर है, लेकिन इसकी मान्यता ऐसी है कि यहां स्नान से वंश वृद्धि और संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है।
दुखहरणी कुंड की लोक कथा तो हृदयस्पर्शी है। बौद्ध ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है, जहां भगवान बुद्ध ने एक दुखी भिक्षुणी को इस कुंड में स्नान करने को कहा था। कथा के अनुसार, वह भिक्षुणी, जो जन्म-जन्मांतर के दुखों से पीड़ित थी, कुंड के गर्म जल में उतरते ही मुक्त हो गई। जैन परंपरा में इसे ‘दु:ख नाशिनी’ कहा जाता है, क्योंकि महावीर स्वामी ने यहां तपस्वियों को दुखों से मुक्ति का उपदेश दिया।
हिंदू मान्यताओं में इसे शिव-पार्वती की लीला से जोड़ा जाता है। जब पार्वती ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की तो शिव ने अपनी जटाओं से यह कुंड उत्पन्न किया, जो दुखों को हर लेता है। आज यह कुंड मलबे में दबा पड़ा है, लेकिन स्थानीय बुजुर्ग आज भी गाते हैं-दुखहरणी मां, तेरे जल में डूबे, सारे कष्ट बह जाएं।
शालिग्राम कुंड वैष्णव भक्ति की धरोहर है। विष्णु भक्तों के लिए शालीग्राम शिला पवित्र होती है, और इस कुंड को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। लोक कथा प्रचलित है कि द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया तो उनकी क्रोधाग्नि से निकला जल राजगीर पहुंचा और शालीग्राम रूप धारण कर लिया। यहां स्नान से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वहीं सरस्वती कुंड, जो अब नरक कुंड के रूप में विकृत हो चुका है। ज्ञान की देवी सरस्वती से जुड़ा है। वेदों और पुराणों में सरस्वती नदी का उल्लेख है, जो राजगीर से होकर बहती थी। किवदंती है कि सरस्वती देवी ने अपनी तपस्या यहां की और यह कुंड विद्या-बुद्धि का स्रोत बना। लेकिन अतिक्रमण और उपेक्षा से यह ‘नरक’ बन गया। बौद्ध परंपरा में इसे बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल से जोड़ा जाता है, जहां ज्ञान की धारा बहती थी।
ये कथाएं न केवल धार्मिक हैं, बल्कि लोक जीवन का हिस्सा हैं। राजगीर के गीतों और नाटकों में इन्हें जीवंत किया जाता है- जैसे ‘सप्तर्षि की लीला’ या ‘पांडव वनवास गाथा’। जैन तीर्थंकरों की कथाओं में इन्हें तपस्या स्थल माना गया है, जबकि सूफी परंपरा में मखदूम कुंड को संत मखदूम सैयद घुलाम अली की कृपा से जोड़ा जाता है, जहां हिंदू-मुस्लिम एक साथ स्नान करते हैं।
इस पौराणिक वैभव के बावजूद हाल के चुनावों में राजगीर के ये कुंड हाशिये पर रहे। प्रत्याशियों के एजेंडे में जाति, पार्टी, नौकरी और सुरक्षा थी, लेकिन भेलवडोभ जलाशय, जिसमें कभी हाथी डूबने लायक जल भरता था। आज उथला और सूखा पड़ा है। पर्यावरण विभाग की मनरेगा से की गई सफाई अपर्याप्त साबित हुई। नतीजा?
ब्रह्मकुंड क्षेत्र के आधे कुंड जमींदोज हो चुके हैं। अग्निधारा, गोदावरी, दुखहरणी, शालिग्राम और सरस्वती जैसे नाम अब यादों में हैं। सरस्वती नदी तो पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है। कोई दल या उम्मीदवार ने नहीं कहा कि जीतने पर ये धरोहरें कैसे बचेंगी। अतिक्रमण, शिलाखंडीकरण और जलवायु परिवर्तन ने इन्हें लील लिया है।
यदि यही हाल रहा तो 2026 का मलमास मेला, जो सैरात भूमि पर लगता है। सांस्कृतिक संकट में फंस सकता है। यहां लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए आते हैं, लेकिन सूखे कुंडों से कैसे? पर्यटन और संस्कृति विभाग की चुप्पी चिंताजनक है। विशेषज्ञों का मानना है कि भेलवडोभ की खुदाई और अतिक्रमण हटाना जरूरी है, ताकि ये धाराएं फिर से बहें।
राजगीर की ये कुंडें न केवल जल हैं, बल्कि जीवंत कथाएं हैं,जो बताती हैं कि प्रकृति और आस्था का संतुलन कैसे टूट रहा है। चुनावी शोर के बाद, अब समय है धरोहर को वोट दें। अन्यथा सप्तर्षियों की अमृतधारा इतिहास की किताबों तक सिमट जाएगी।





