
राजगीर (नालंदा दर्पण)। कभी जिन महिलाओं को केवल घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया जाता था, आज वही महिलाएं समाज की सोच बदलने की अगुवाई कर रही हैं। समय के साथ बदली मानसिकता और बढ़ते अवसरों ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का हौसला दिया है।
इसका सशक्त उदाहरण आज वैश्विक पर्यटन नगरी राजगीर में देखने को मिल रहा है, जहां महिलाएं ई-रिक्शा चलाकर न केवल अपनी आजीविका चला रही हैं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल भी पेश कर रही हैं।
राजगीर की सड़कों पर दौड़ते ई-रिक्शा अब सिर्फ सवारी ढोने का जरिया नहीं रह गए हैं, बल्कि यह उन महिलाओं की मेहनत, आत्मविश्वास और संघर्ष की कहानी भी बयान कर रहे हैं, जिन्होंने गरीबी और सामाजिक बाधाओं को पीछे छोड़कर अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला किया।
नईपोखर की रहने वाली दिव्यांग सोनी कुमारी इसकी जीवंत मिसाल हैं। तीन बहनों और एक भाई के बीच मंझली संतान सोनी बताती हैं कि लंबे समय तक उन्हें कोई स्थायी रोजगार नहीं मिल सका। आर्थिक तंगी और दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चेतनालय संस्था द्वारा निशुल्क उपलब्ध कराए गए ई-रिक्शा ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
आज सोनी प्रतिदिन सुबह से शाम तक ई-रिक्शा चलाकर 600 से 700 रुपये तक की कमाई कर लेती हैं। यह आय न सिर्फ उनके परिवार के लिए सहारा बनी है, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान भी दिला रही है।
इसी तरह कोणार्क नगर की रिंकी कुमारी और सिलाव की गीता कुमारी भी अब ई-रिक्शा की स्टेयरिंग संभालकर आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ चुकी हैं। जिस ड्राइविंग क्षेत्र को कभी पुरुषों का वर्चस्व वाला माना जाता था, वहां आज ये महिलाएं पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
महिला चालकों की यह बढ़ती भागीदारी सिर्फ राजगीर तक सीमित नहीं है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक महिलाएं कैब, पिंक बस और अब ई-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन साधनों का संचालन कर रही हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि ई-रिक्शा महिलाओं के लिए रोजगार का एक सुलभ और प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है।
ई-रिक्शा ने इन महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता देने के साथ-साथ समाज में सम्मान और पहचान भी दिलाई है। कम लागत, आसान संचालन और न्यूनतम औपचारिकताओं के कारण यह साधन महिलाओं के लिए रोजगार का बेहतर विकल्प साबित हो रहा है। साथ ही यह पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण प्रदूषण कम करने में भी सहायक है।
हालांकि राजगीर में महिला ई-रिक्शा चालकों की संख्या अभी सीमित है, लेकिन रिंकी, सोनी और गीता जैसी महिलाएं अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं। उनकी यह पहल साफ तौर पर दर्शाती है कि यदि महिलाओं को अवसर और विश्वास मिले, तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकती हैं, बल्कि समाज की सोच को भी सकारात्मक दिशा में बदल सकती हैं।







