सिद्धपीठ मां शीतला मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, जानें आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम
Three-day Sheetala Ashtami fair near Bihar Sharif attracts devotees from across India; unique Basiyoura ritual and historic ‘Mitti Kuan’ remain center of faith

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक मघड़ा ग्राम इन दिनों भक्ति और आस्था के अनोखे संगम का केंद्र बन गया है। पंचाने नदी के पश्चिमी तट पर अवस्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला मंदिर में तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेले का भव्य शुभारंभ हो चुका है।
चैत्र कृष्ण सप्तमी से आरंभ होने वाला यह मेला न केवल बिहार, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इसके अलावा नेपाल और अन्य देशों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। जैसे-जैसे अष्टमी का दिन नजदीक आता है, मघड़ा गांव की गलियां और मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार होने लगती हैं।
इतिहास और आस्था की गहराई में मघड़ाः मघड़ा स्थित मां शीतला मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर की प्राचीनता का उल्लेख प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में भी मिलता है।
मंदिर पुजारी मिथलेश कुमार मिश्रा के अनुसार जब ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, तब वे बड़ी पहाड़ी स्थित पुस्तकालय से विश्वविद्यालय जाते समय इसी क्षेत्र में नीम और पीपल के वृक्षों की छांव में विश्राम किया करते थे। उन्होंने अपने यात्रा विवरण में इस देवी स्थल का उल्लेख भी किया है। इससे इस स्थान की ऐतिहासिक महत्ता का संकेत मिलता है।
पौराणिक कथा से जुड़ा नाम मघड़ाः स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस गांव के नाम के पीछे भी एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर के खंड किए थे, तब भगवान शिव ने उनके अवशेषों को एक ‘मघ’ अर्थात घड़े में रखकर इसी स्थान पर छिपाया था। इसी ‘मघ’ शब्द से कालांतर में इस गांव का नाम ‘मघड़ा’ पड़ा।
एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा वृषकेतु को स्वप्न में मां शीतला ने दर्शन दिए और यहां खुदाई कराने का संकेत दिया। खुदाई के दौरान मां की प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई और यह स्थान सिद्धपीठ के रूप में विख्यात हो गया।
बसियौरा पूजा अनोखी परंपरा का प्रतीकः मघड़ा के शीतलाष्टमी मेले की सबसे अनोखी परंपरा ‘बसियौरा’ पूजा है। सप्तमी के दिन श्रद्धालु चने की दाल, चावल और सब्जी का प्रसाद तैयार करते हैं। इसके बाद अष्टमी के दिन उसी बासी प्रसाद को मां शीतला को भोग लगाया जाता है।
इस दिन पूरे गांव में चूल्हा नहीं जलाया जाता और स्वच्छता की ऐसी परंपरा निभाई जाती है कि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाई जाती। मान्यता है कि मां शीतला को ठंडा और बासी भोजन प्रिय है, इसलिए यह पूजा विशेष महत्व रखती है।
मिट्टी कुआं का रहस्य और श्रद्धाः मंदिर परिसर के समीप स्थित ऐतिहासिक ‘मिट्टी कुआं’ इस मेले का एक प्रमुख आकर्षण है। श्रद्धालु इसी कुएं के जल से बसियौरा प्रसाद तैयार करते हैं।
लोकमान्यता है कि यही वह स्थान है जहां से मां शीतला की प्रतिमा प्रकट हुई थी। इसी कारण यहां कुएं का निर्माण हुआ। आश्चर्यजनक बात यह है कि भीषण गर्मी में भी इस कुएं का जल कभी सूखता नहीं है। श्रद्धालुओं के लिए यह आस्था और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है।
रोग मुक्ति की आस्थाः मां शीतला को परंपरागत रूप से चेचक और अन्य चर्म रोगों की देवी माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह विश्वास प्रबल है कि मां के दरबार का जल और भभूत लगाने से चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है।
मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां ‘जीव के बदले जीव’ अर्पित करने की परंपरा निभाते हैं। इसके तहत कबूतर और अन्य जीवों को मंदिर में चढ़ाया जाता है।
सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर प्रशासन की नजरः हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए इस बार नगर निगम और जिला प्रशासन ने सुरक्षा और सुविधाओं के विशेष इंतजाम किए हैं। पूरे मेला क्षेत्र को सीसीटीवी कैमरों से लैस किया गया है। मंदिर परिसर में 16 और बाहरी क्षेत्रों में 20 कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी निगरानी कंट्रोल रूम से की जाएगी।
इसके अलावा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पर्याप्त लाइटिंग, पेयजल, मोबाइल शौचालय और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। पास स्थित तालाब में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए एसडीआरएफ की टीम को भी तैनात रहने का निर्देश दिया गया है।
परंपरा, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का संगमः शीतलाष्टमी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेले के दौरान आसपास के गांवों में अस्थायी बाजार सजते हैं, जहां खिलौने, पूजा सामग्री, मिठाइयां और स्थानीय हस्तशिल्प की बिक्री होती है।
इस प्रकार मघड़ा का यह ऐतिहासिक मेला आस्था, इतिहास, लोकपरंपरा और सामाजिक जीवन के अद्भुत संगम के रूप में हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
रोगों को शांत कर आरोग्य देने वाली देवी हैं मां शीतलाः लखीसराय के समाजसेवी किशोर वर्मा ने कहा कि मां शीतला हिन्दू धर्म में रोगों को शांत करने वाली तथा आरोग्य प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजित हैं। “शीतला” शब्द का अर्थ ही शीतलता प्रदान करने वाली शक्ति से है, अर्थात वह देवी जो शरीर और मन के ताप को शांत करती हैं।
उन्होंने बताया कि लोक परंपराओं में मां शीतला को विशेष रूप से चेचक, ज्वर और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। ग्रामीण भारत में आज भी उनके प्रति गहरी आस्था देखी जाती है और लोग रोगों से मुक्ति की कामना लेकर उनकी पूजा करते हैं।
आदि शक्ति का करुणामयी स्वरूपः किशोर वर्मा के अनुसार धार्मिक मान्यता में मां शीतला को आदि शक्ति का करुणामयी रूप माना गया है। वे संसार के रोग-दोषों को अपने अधीन रखकर भक्तों को स्वास्थ्य, शांति और संरक्षण प्रदान करती हैं।
देवी के स्वरूप में उनके हाथों में झाड़ू, कलश, सूप (पंखा) और नीम की पत्तियां दिखाई देती हैं। ये सभी प्रतीक रोगों को दूर करने, शुद्धता बनाए रखने और वातावरण को पवित्र रखने का संकेत देते हैं। उनका वाहन गधा बताया गया है और कई चित्रों में वे कमल पर विराजमान भी दिखाई देती हैं।
पुराणों में भी मिलता है उल्लेखः किशोर वर्मा ने बताया कि मां शीतला का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। विशेष रूप से स्कन्द पुराण, भविष्य पुराण और लोक परंपराओं में प्रचलित शीतला महात्म्य में उनकी महिमा का वर्णन किया गया है।
इन ग्रंथों के अनुसार देवी शीतला रोगों की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। जब मनुष्य धर्म, स्वच्छता और संयम से दूर होता है तो रोग उत्पन्न होते हैं और देवी की कृपा से वही रोग शांत भी हो जाते हैं। इसी कारण ग्रामीण समाज में शीतला माता की पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है।
साधक और भक्त दोनों करते हैं साधनाः उन्होंने कहा कि मां शीतला की साधना केवल सामान्य भक्त ही नहीं, बल्कि कई साधक और तांत्रिक भी करते हैं। ग्राम देवता की परंपरा में रोग निवारण के लिए परिवार और गांव के लोग सामूहिक रूप से उनकी पूजा करते हैं। तांत्रिक साधनाओं में भी शीतला माता को रोगों और नकारात्मक शक्तियों को शांत करने वाली दिव्य शक्ति माना जाता है।
शीतला अष्टमी और बसोड़ा का विशेष महत्वः चैत्र और वैशाख मास में आने वाली शीतला अष्टमी तथा बसोड़ा पर्व के दिन देवी की विशेष पूजा की जाती है। इन दिनों भक्त माता को बासी भोजन का भोग लगाते हैं, जिसे बसियौरा या बसोड़ा कहा जाता है। यह परंपरा शीतलता और संयम का प्रतीक मानी जाती है।
धार्मिक परंपराओं में मां शीतला की स्तुति इस प्रकार की जाती है-
शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालंकृत-मस्तकाम् ॥
नमामि शीतलां देवीं सर्वरोगभयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तन्ते विस्फोटकभयं महत् ॥
इस स्तोत्र का अर्थ है कि गधे पर विराजमान, हाथ में झाड़ू और कलश धारण करने वाली मां शीतला को प्रणाम है, जो सभी रोगों और भय को दूर करने वाली हैं। उनकी शरण में जाने से बड़े से बड़ा रोग भी शांत हो जाता है।
श्रद्धा, शुद्धता और संयम से होती है कृपाः भक्तों की मान्यता है कि मां शीतला की सच्चे मन से उपासना करने पर शरीर के रोग शांत होते हैं, घर में स्वास्थ्य और शांति बनी रहती है तथा नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसलिए उनकी साधना सदैव शुद्धता, संयम और श्रद्धा के साथ करने की परंपरा है। माना जाता है कि देवी की कृपा से जीवन में आरोग्य, संतुलन और मानसिक शांति प्राप्त होती है। स्रोतःनालंदा दर्पण/मीडिया रिपोर्टस्





