1551 कलशों के साथ इस्लामपुर में भव्य शोभायात्रा, जय श्री राम के नारों से गूंजा शहर

हनुमान मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा महायज्ञ की शुरुआत, तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान से क्षेत्र में आस्था और सामाजिक एकता का संदेश

“इस्लामपुर की यह भव्य शोभायात्रा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह सामाजिक एकता, आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है…

इस्लामपुर (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के इस्लामपुर शहर में धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकजुटता का अद्भुत नज़ारा देखने को मिला, जब पटना रोड स्थित हनुमान मंदिर में आयोजित श्री हनुमत् प्राण प्रतिष्ठा महायज्ञ के पूर्व भव्य कलश शोभायात्रा निकाली गई। 1551 कलशों के साथ निकली इस यात्रा ने पूरे शहर को भक्ति रस में डुबो दिया, वहीं “जय श्री राम” के उद्घोष से वातावरण गूंजायमान हो उठा।

यह शोभायात्रा वुढानगर सूर्य सरोवर से शुरू हुई, जहां श्रद्धालुओं ने विधिपूर्वक जलभरण किया। इसके बाद गाजे-बाजे, झांकियों और धार्मिक ध्वजों के साथ हजारों की संख्या में श्रद्धालु नगर भ्रमण करते हुए महायज्ञ स्थल तक पहुंचे। यात्रा में शामिल महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश लिए चल रही थीं, जो इस आयोजन की भव्यता और आध्यात्मिक गरिमा को और भी बढ़ा रही थीं।

पूजा प्रबंध समिति के अध्यक्ष मुकेश राय, सचिव सुरेंद्र सिंह और कोषाध्यक्ष भागवत सिंह यादव ने बताया कि यह आयोजन पूर्णतः जनसहयोग से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के धार्मिक आयोजन न केवल आस्था को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि समाज में सामूहिक भागीदारी और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूत बनाते हैं।

आयोजन समिति के अनुसार इस महायज्ञ के तहत 18 अप्रैल को जलाहरण, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन और मूर्ति संस्कार जैसे अनुष्ठान संपन्न होंगे। 19 अप्रैल को जलाधिवास, अन्नाधिवास और फलाधिवास की प्रक्रिया पूरी की जाएगी, जबकि 20 अप्रैल को शिखर कलश यात्रा, नगर भ्रमण, प्राण प्रतिष्ठा और यज्ञ पूर्णाहुति के साथ भव्य भंडारे का आयोजन होगा।

विशेष आकर्षण के रूप में वृंदावन से पधारे स्वामी हरेरामाचार्य जी महाराज द्वारा प्रतिदिन संध्या 7 बजे से 10 बजे तक रासलीला और आरती का आयोजन किया जाएगा, जो श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र बनेगा।

इस आयोजन में व्यापार मंडल और स्थानीय समाज के कई प्रमुख लोग सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। आयोजन समिति के सदस्यों और स्थानीय युवाओं की भागीदारी ने इसे एक जन-उत्सव का रूप दे दिया है।

इस प्रकार के धार्मिक आयोजन ग्रामीण और शहरी समाज के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य करते हैं। यह केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक समरसता, स्थानीय अर्थव्यवस्था में सक्रियता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खासकर ऐसे समय में, जब समाज तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, इस तरह के आयोजन लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं।

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