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राजगीर के सूखते गर्मजल कुंड स्रोतों के पीछे मानवीय हस्तक्षेप या प्राकृतिक बदलाव?

“यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राजगीर के ये ऐतिहासिक कुंड केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएंगे…

राजगीर (नालंदा दर्पण)। बिहार के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले पर्यटन स्थल राजगीर के प्रसिद्ध गर्मजल कुंड इन दिनों अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। सदियों से निरंतर प्रवाहित होते रहे ये कुंड अब सूखने लगे हैं, जिससे न केवल स्थानीय आस्था बल्कि पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन सक्रिय हो गया है और मामले की तह तक जाने के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया है।

जिला पदाधिकारी कुंदन कुमार के निर्देश पर गठित इस समिति में लघु सिंचाई विभाग के कार्यपालक अभियंता, राजगीर के अनुमंडल पदाधिकारी तथा नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी को शामिल किया गया है। समिति को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वह राजगीर क्षेत्र के सभी गर्मजल कुंडों और झरनों का भौतिक सत्यापन कर उनकी वर्तमान स्थिति का विस्तृत आकलन करे।

क्या कहती है प्रारंभिक जांच? अनुमंडल पदाधिकारी सूर्य प्रकाश गुप्ता के अनुसार प्रारंभिक जांच में जो संकेत सामने आए हैं, वे चिंताजनक हैं। कुंडों के आसपास तेजी से विकसित हो रहे होटल, रिसॉर्ट, पार्क और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा कराए गए गहरे बोरवेल इस समस्या की एक प्रमुख वजह बनकर उभरे हैं। भूजल के अत्यधिक दोहन से प्राकृतिक जल स्रोतों का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे कुंडों का जलस्तर तेजी से घट रहा है।

इसी कड़ी में प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए पांडू पोखर क्षेत्र में संचालित सात बोरिंग को तत्काल प्रभाव से बंद करा दिया है। साथ ही आसपास के अन्य प्रतिष्ठानों के बोरिंग की निगरानी भी तेज कर दी गई है।

प्राकृतिक बनाम कृत्रिम कारण जांच का केंद्रः प्रशासन इस पूरे मामले को दो प्रमुख दृष्टिकोणों से देख रहा है प्राकृतिक और कृत्रिम कारण। यदि यह समस्या प्राकृतिक कारणों जैसे भूगर्भीय बदलाव या जलस्तर में स्वाभाविक गिरावट के कारण उत्पन्न हुई है तो भूगर्भ वैज्ञानिकों की मदद से इसका समाधान खोजा जाएगा। वहीं यदि जांच में यह स्पष्ट होता है कि मानव गतिविधियों के कारण यह स्थिति बनी है, तो संबंधित बोरिंग पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ-साथ वैज्ञानिक अध्ययन और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

भौतिक सत्यापन और रिपोर्ट की तैयारीः समिति द्वारा एक-एक कुंड और झरने का निरीक्षण किया जा रहा है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि कितने कुंड पूरी तरह सूख चुके हैं, कितने सूखने के कगार पर हैं और कितने जमींदोज हो चुके हैं।

साथ ही कई कुंडों तक पहुंचने के रास्ते भी या तो अवरुद्ध हो गए हैं या पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं, जिससे उनके संरक्षण और निरीक्षण में भी बाधा उत्पन्न हो रही है। इन सभी तथ्यों को संकलित कर समिति एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसके आधार पर आगे की कार्ययोजना तय की जाएगी।

पर्यटन और आस्था पर संभावित प्रभावः राजगीर के गर्मजल कुंड न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यहां आने वाले हजारों पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं। यदि इन कुंडों का अस्तित्व संकट में पड़ता है तो इसका सीधा असर स्थानीय पर्यटन उद्योग, रोजगार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

जनसहभागिता की अपीलः प्रशासन ने स्थानीय नागरिकों से भी सहयोग की अपील की है। यदि किसी क्षेत्र में बोरिंग या चापाकल से गर्म पानी निकलता है तो इसकी सूचना प्रशासन को देने के लिए कहा गया है। सूचना देने वालों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।

विकास बनाम संरक्षण की चुनौतीः राजगीर का यह मामला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की एक बड़ी चुनौती को उजागर करता है। एक ओर पर्यटन और शहरीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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