राजगीर (नालंदा दर्पण)। प्राचीन धार्मिक नगरी राजगीर एक बार फिर अपने ऐतिहासिक मलमास मेला के कारण चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह श्रद्धा नहीं, बल्कि उस आस्था के क्षरण की चिंता है जो सदियों से यहां की पहचान रही है। इस आस्था के केंद्र में रही सरस्वती नदी आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती नजर आ रही है।
जहां स्नान से खुलते थे मोक्ष के द्वारः स्थानीय मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार राजगीर की सरस्वती नदी को अदृश्य दिव्य धारा का प्रकट स्वरूप माना जाता रहा है। यह मान्यता महाभारत और स्कंद पुराण में वर्णित तीर्थ स्नान परंपराओं से भी जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि मलमास के दौरान यहां स्नान करने से पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
लोककथाओं में एक रोचक प्रसंग मिलता है। कहा जाता है कि स्वयं भगवान ब्रह्मा ने इस धारा को ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक बनाकर धरती पर प्रवाहित किया था। इसी कारण श्रद्धालु पहले सरस्वती में स्नान कर आत्मशुद्धि करते, फिर गर्म जल कुंडों में डुबकी लगाकर शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त करते थे।
अब सीधे कुंडों की ओरः वर्षों पुरानी यह परंपरा अब टूटती नजर आ रही है। श्रद्धालु अब सरस्वती नदी को नजरअंदाज कर सीधे गर्म जल कुंडों का रुख कर रहे हैं। वजह साफ है। नदी का प्रदूषित और बदहाल स्वरूप। जहां कभी स्वच्छ जल में श्रद्धालु आचमन करते थे, आज वहां गाद, कचरा और ठहरा हुआ पानी दिखाई देता है।
क्या बदली गई नदी की पहचान? स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली तत्वों ने सुनियोजित तरीके से नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर उसे ‘कुंड’ का रूप दे दिया है। इससे न केवल जलधारा अवरुद्ध हुई, बल्कि उसकी पारिस्थितिकी भी प्रभावित हुई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी नदी का अस्तित्व उसके प्रवाह में होता है। जब प्रवाह रुकता है तो वह नदी नहीं, मात्र जलभराव बनकर रह जाती है और यही स्थिति आज सरस्वती के साथ दिख रही है।
करोड़ों खर्च, फिर भी बदहाली क्यों? हर वर्ष मलमास मेला से पहले जल संसाधन विभाग द्वारा नदी की सफाई, उड़ाही और सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
स्थानीय बुद्धिजीवियों का आरोप है कि यह मामला केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का संकेत देता है। सफाई के नाम पर औपचारिकता निभाई जाती है, जबकि वास्तविक कार्य बेहद सीमित रहता है।
आस्था का आधार खतरे में: संत समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो सरस्वती नदी पूरी तरह अपनी पहचान खो देगी। उनके अनुसार यह सिर्फ एक नदी का संकट नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा के विघटन का संकेत है।
सांस्कृतिक विरासत पर गहराता संकटः राजगीर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहर का जीवंत केंद्र है। यहां की हर परंपरा चाहे वह कुंडों का स्नान हो या सरस्वती नदी की पूजा एक गहरी सांस्कृतिक परत को दर्शाती है। यदि सरस्वती नदी इसी तरह उपेक्षित रही तो आने वाले समय में मलमास मेला केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएगा।
समाधान की दिशा: क्या हो सकता है? विश्लेषकों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयास जरूरी हैं। नदी के प्राकृतिक प्रवाह की बहाली, वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाना, प्रदूषण स्रोतों पर सख्त नियंत्रण , स्थानीय समुदाय की भागीदारी, और सबसे महत्वपूर्ण पारदर्शिता के साथ सरकारी कार्यान्वयन जैसे कदम उठाने होंगे।
वेशक सरस्वती नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि आस्था और इतिहास की जीवित धरोहर है। अगर इसे बचाने के लिए अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह मोक्षदायिनी धारा इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी।
राजगीर की पहचान, उसकी परंपरा और उसकी आध्यात्मिक आत्मा सब कुछ इस एक नदी से जुड़ा है। अब यह सरकार, समाज और श्रद्धालुओं पर निर्भर है कि वे इसे पुनर्जीवित कर पाते हैं या इसे खो देने का इंतजार करते हैं।



