गजब, इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में गरीब मरीजों को इलाज के लिए जरुरी है एंड्रॉयड मोबाइल!

हिलसा (नालंदा दर्पण)। समूचे नालंदा जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था का बुरा हाल है। इसी बीच इस्लामपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से जुड़े एक अजीबोगरीब सूचना सामने आई है। यहां मरीजों को इलाज करवाने के लिए उनके पास एंड्रॉयड मोबाइल का होना जरुरी है। यह फरमान विभागीय नहीं है, बल्कि अस्पताल के प्रभारी चिकत्सक का है। जबकि इस ग्रामीण ईलाके में 70 फीसदी आबादी के पास महंगा एंड्रॉयड मोबाइल और उसमें इंटनेट की सुविधा नहीं है।

खबर है कि इस्लामपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज कराने पहुंचने वाले गरीब मरीजों को अब एंड्रॉयड मोबाइल के साथ आना होगा। अगर उनके पास एंड्रॉयड मोबाइल नहीं होगा तो उनका ओपीडी में  उनका इलाज नहीं हो पायेगा।

इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज से पहले पर्ची कटाने की नई व्यवस्था लागू की गयी है। मरीज घर बैठे अपना नंबर लगा सकते हैं। पोर्टल पर निबंधन करने के बाद उनके मोबाइल नंबर पर एक टोकन नंबर आ जायेगा। उसी टोकन नंबर को यहां पर्ची काउंटर पर बताना होगा, जिसके बाद उनकी पर्ची निकाल दी जायेगी।

हालांकि, इन अस्पतालों में पहुंचने वाले 70 प्रतिशत से अधिक मरीजों के पास मोबाइल नंबर अब भी नहीं है और है भी तो उनके पास एंड्रॉयड मोबाइल नहीं है। ऐसा में उनका इलाज नहीं हो पायेगा और उन्हें वापस घर लौटना पड़ेगा या नीजि अस्पतालों की ओर रुख करना होगा।

वहीं इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों को एक बड़ी रोचक सुविधा जरूर मिली है। अगर मरीज के पास एक वर्ष पुरानी भी पर्ची होगी तो उनके इलाज के लिए नयी पर्ची निकाली जा सकती है। कहा जाता है कि यह सब पर्ची काउंटर से भीड़ कम करने की कवायद के तहत उपरी निर्देश पर शुरू किया गया है।

विभागीय दलील है कि इस व्यवस्था से सरकारी अस्पताल में दिखाने से पहले घर बैठे मरीज ओपीडी के लिए नंबर लगा सकते हैं। इसके लिए उन्हें अपने एंड्रॉयड मोबाइल फोन में भव्या एप इंस्टॉल करना होगा। इसमें अपनी सभी सूचनाएं देनी होगी, जिसके बाद टोकन नंबर जेनरेट होगा। इसी टोकन नंबर को काउंटर पर बताना होगा और आपकी पर्ची निकल जायेगी।

इस संबंध में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इस्लामपुर के प्रभारी चिकत्सक डॉक्टर बाल्मिकी प्रसाद सिन्हा का दो टूक कहना है कि फिलहाल कोई वैकल्पिक उपाय नहीं है। जिनके पास एंड्रॉयड मोबाइल मोबाइल नंबर नहीं है। उनके लिए स्वास्थ्य विभाग ने अब तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की है।

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