राजगीर (नालंदा दर्पण)। करघे की खट-खट और रेशम के तारों की नृत्य करती लय के बीच सिलाव (नालंदा) की ऐतिहासिक भूमि एक बार फिर अपनी बुनकरी कला के लिए सुर्खियों में है। सिलाव प्रखंड के नेपुरा गांव के कुशल बुनकर कमलेश राम को उनकी बावनबुटी शिल्क साड़ी की उत्कृष्ट कारीगरी के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।
यह सम्मान उन्हें 7 अगस्त, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार की खबर ने नेपुरा गांव में उत्साह की लहर दौड़ा दी है, जहां ग्रामीण गर्व और खुशी से झूम रहे हैं।
बावनबुटी साड़ी नालंदा की एक अनमोल हस्तकला है, जिसकी जड़ें बौद्ध काल से जुड़ी हैं। इस कला की खासियत है कि एक साड़ी में 52 अलग-अलग बूटियां (डिज़ाइन) उकेरी जाती हैं, जो बौद्ध दर्शन और नालंदा की शैली को दर्शाती हैं।
यह परंपरा सतयुग में भगवान विष्णु के वामन अवतार और त्रेतायुग में प्रभु राम द्वारा सुग्रीव को भेंट की गई शॉल से प्रेरित मानी जाती है। इस कला की शुरुआत गया के तत्वा टोला में हुई थी और यह साड़ियां, शॉल और चादर राष्ट्रपति भवन से लेकर विदेशी मेहमानों तक उपहार के रूप में पहुंची हैं।
नेपुरा गांव के साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले कमलेश राम का जीवन करघे के इर्द-गिर्द बुना गया है। “यह पुरस्कार मेरे अकेले का नहीं, बल्कि मेरे परिवार और समुदाय की मेहनत का फल है,” कमलेश राम ने भावुक होकर कहा।
उनका पूरा परिवार महिलाएं, पुरुष और युवा दिन-रात करघे पर मेहनत करता है। उनकी बनाई साड़ियां मुंबई, दिल्ली, वाराणसी, कोलकाता और जयपुर जैसे महानगरों में खूब पसंद की जाती हैं।
उन्होंने अमेरिका, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेलों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है, जहां उनके डिज़ाइनों की खूब सराहना हुई।
बता दें कि कमलेश राम से पहले नालंदा के बसवनबिगहा गांव के स्व. कपिलदेव प्रसाद ने बावनबुटी शिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई थी। 2019 में उन्हें राष्ट्रीय बुनकर पुरस्कार और 2023 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
उनकी बनाई भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न प्रतिमा वाली वॉल हैंगिंग ने राष्ट्रपति भवन में भी स्थान पाया था। कमलेश राम इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और उनका यह पुरस्कार नालंदा की बुनकरी परंपरा के लिए एक नई सुबह का प्रतीक है।
बहरहाल यह पुरस्कार केवल कमलेश राम की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह नालंदा के हथकरघा उद्योग के लिए एक मील का पत्थर है। यह सम्मान नेपुरा गांव को नई पहचान देगा और युवाओं को इस पारंपरिक कला की ओर आकर्षित करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बावनबुटी साड़ी को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिले तो यह न केवल कारीगरों को आर्थिक लाभ देगा, बल्कि इस कला को वैश्विक स्तर पर और मजबूती प्रदान करेगा। क्योंकि नालंदा की बावनबुटी साड़ी केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
