बिहार शिक्षा विभाग के ACS डॉ. सिद्धार्थ का इस्तीफा, जानें असल सच
बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार शिक्षा विभाग में एक बार फिर से हलचल मच गई है। अपर मुख्य सचिव (ACS) और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. एस सिद्धार्थ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि इस खबर की खंडन की सूचना मिल रही है। सूत्रों के अनुसार उन्होंने 17 जुलाई 2025 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन सौंपा, जो अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास विचाराधीन है।
इस खबर ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में, बल्कि सियासी हलकों में भी सनसनी फैला दी है। आखिर क्या कारण है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले इस अधिकारी ने इतना बड़ा कदम उठाया? क्या यह इस्तीफा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एक सियासी रणनीति का हिस्सा है? आइए इस खबर के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।
1991 बैच के IAS अधिकारी डॉ. एस सिद्धार्थ बिहार सरकार के सबसे प्रभावशाली नौकरशाहों में से एक रहे हैं। शिक्षा विभाग के ACS के रूप में, उन्होंने कई महत्वपूर्ण सुधार लागू किए, जिनमें मॉडल स्कूलों की स्थापना, शिक्षक प्रशिक्षण और ई-शिक्षाकोष जैसे डिजिटल पहल शामिल हैं। उनकी कार्यशैली को लेकर शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ रही हैं। कुछ ने उनकी सख्ती और तकनीकी दृष्टिकोण की सराहना की तो कुछ ने इसे अत्यधिक कठोर माना।
हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उनके इस्तीफे की खबरों का खंडन भी किया गया। डॉ. सिद्धार्थ ने शिक्षा विभाग के मीडिया ग्रुप पर स्पष्ट किया कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि VRS के लिए आवेदन किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस्तीफा और VRS के बीच का यह तकनीकी अंतर महज औपचारिकता है या इसके पीछे कोई गहरी वजह छिपी है?
सूत्रों के मुताबिक डॉ. सिद्धार्थ का इस्तीफा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एक सुनियोजित कदम हो सकता है। कई समाचार स्रोतों ने दावा किया है कि वे जनता दल यूनाइटेड (JDU) के टिकट पर नवादा जिले से विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। यह पहली बार नहीं है जब कोई IAS अधिकारी नौकरशाही छोड़कर राजनीति में कदम रख रहा हो, लेकिन सिद्धार्थ का यह कदम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी होने के कारण विशेष रूप से चर्चा में है।
क्या यह संभव है कि सिद्धार्थ की सख्त प्रशासनिक छवि और शिक्षा विभाग में उनके सुधार उन्हें एक मजबूत राजनीतिक उम्मीदवार बनाते हैं? या फिर यह केवल अटकलें हैं और उनके VRS की वजह निजी है, जैसा कि कुछ स्रोतों ने दावा किया है?
शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि डॉ. सिद्धार्थ का कार्यकाल चुनौतीपूर्ण रहा है। उनकी सख्त नीतियों ने कई लोगों को प्रभावित किया, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में सुधार भी देखने को मिले। उनका राजनीति में जाना आश्चर्यजनक नहीं होगा।
डॉ. सिद्धार्थ का इस्तीफा ऐसे समय में आया है, जब बिहार का शिक्षा विभाग पहले से ही कई विवादों और चुनौतियों से जूझ रहा है। उनके कार्यकाल में ई-शिक्षाकोष पोर्टल, शिक्षकों की उपस्थिति पर निगरानी और निजी स्कूलों में RTE के तहत अनियमितताओं की जांच जैसे कदम उठाए गए। लेकिन उनके अचानक जाने से क्या ये पहल अधूरी रह जाएँगी? क्या नया ACS उनकी नीतियों को आगे बढ़ाएगा या शिक्षा विभाग में फिर से बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे?
नालंदा के एक शिक्षक राजेश कुमार ने अपनी राय साझा करते हुए कहा कि ACS साहब की सख्ती ने हमें अनुशासित तो किया, लेकिन कई बार उनकी नीतियाँ अव्यावहारिक भी लगीं। अब उनके जाने के बाद हमें उम्मीद है कि नया नेतृत्व शिक्षकों की समस्याओं को और गंभीरता से लेगा।
सोशल मीडिया, खासकर X पर, इस खबर को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कुछ यूजर्स का मानना है कि सिद्धार्थ का इस्तीफा नीतीश सरकार के लिए एक बड़ा झटका है। जबकि अन्य का कहना है कि यह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पहला कदम है।
एक X पोस्ट में लिखा गया कि ACS सिद्धार्थ का इस्तीफा शिक्षा विभाग के लिए नुकसान है, लेकिन अगर वे JDU से चुनाव लड़ते हैं तो यह बिहार की सियासत में नया मोड़ ला सकता है।
डॉ. सिद्धार्थ के VRS आवेदन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अंतिम मंजूरी का इंतजार है। यदि उनका इस्तीफा स्वीकार हो जाता है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वे राजनीति में कितना प्रभाव डाल पाते हैं। साथ ही शिक्षा विभाग में उनकी जगह कौन लेगा और क्या नया नेतृत्व उनकी नीतियों को आगे बढ़ाएगा, यह भी एक बड़ा सवाल है।










