12 उर्दू शिक्षकों की फर्जी बहाली में फंसी नालंदा DPO और बेन BEEO की गर्दन

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार का नालंदा जिला शिक्षा विभाग अपने अजीबोगरीब कारनामों के लिए हमेशा सुर्खियों में बना रहता है। इस बार का मामला अजब और कार्रवाई गजब है। बेन प्रखंड में उर्दू का एक भी छात्र मौजूद नहीं है, लेकिन, नाम उर्दू प्राथमिक विद्यालय मैजरा है। हद तो यह कि यहां उर्दू के दो शिक्षकों के पद स्वीकृत करते हुए तैनाती भी कर दी गयी।

ben education newsइतना ही नहीं, बेन प्रखंड के सात स्कूलों में 12 उर्दू शिक्षकों की गलत तरीके से बहाली कर दी गयी। इस मामले में स्थापना डीपीओ सुजीत कुमार के साथ ही बेन प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी गंभीर रूप से फंस गये हैं।

डीएम शशांक शुभंकर के आदेश पर ममाले की जांच के बाद डीपीओ ने कहा कि उर्दू पद पर तैनात शिक्षक उर्दू छात्रों के न रहने के कारण हिन्दी पढ़ाते हैं।

वहीं डीपीओ की सफाई को पूरी तरह गलत बताते हुए डीएम ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी यह दलील पूरी तरह औचित्यहीन है। जबकि, शिकायतकर्ता जोगाबिगहा के आरटीआई कार्यकर्ता धनंजय कुमार उर्फ गुड्डू ने कहा कि शिक्षकों की पद स्वीकृति व उनकी तैनाती में बड़े पैमाने पर धांधली की गयी है। बेन का यह मामला महज एक बानगी है।

जानें क्या है मामलाः वर्ष 2019 में स्कूलों में छात्रों की औसत मौजूदगी के आधार पर पदों की स्वीकृति कर नये बहाल शिक्षकों की तैनाती की गयी थी। बेन के सात स्कूलों में 12 उर्दू शिक्षकों के पद स्वीकृत कर उनकी तैनाती कर दी गयी। जबकि, उतने शिक्षकों की जरूरत नहीं थी।

इस मामले को गुड्डू कुमार ने लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के यहां उठाया। लेकिन, किसी प्रकार की कार्रवाई न होने पर मामला डीएम तक पहुंचा। उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच का आदेश डीईओ को दिया।

तत्कालीन डीईओ जियाउल होदा खान ने स्थापना डीपीओ से मामले की जांच करायी। उन्होंने अपनी जांच में गलत दलील देकर मामले को रफा-दफा करने का भरसक प्रयास किया। लेकिन, डीएम उनकी मंशा को भांप गये और उचित कार्रवाई करने को कहा है

बोले श्री सुजीत कुमार, जिला कार्यक्रम पदाधिकारीः जिन स्कूलों में आवश्यकता से अधिक शिक्षकों की तैनाती की गयी है, वहां के उर्दू शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में भेजा जाएगा। ताकि, छात्रों की औसत उपस्थिति के समानुपातिक रूप से शिक्षकों की पदस्थापना हो।

बोले श्री शशांक शुभंकर, जिलाधिकारीः मामला काफी संगीन है। डीपीओ की जांच रिपोर्ट में दी गयी दलील औचित्यहीन है। किसी भी सूरत में विभागीय नियमों के प्रतिकूल जाने की इजाजत किसी अधिकारी अथवा कर्मी को नहीं दी जा सकती है।

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