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हिलसा शहीद स्मारक: अगस्त क्रांति 1942 के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि

हिलसा (नालंदा दर्पण)। हिलसा शहीद स्मारक स्थल उन 11 अमर वीर सपूतों की गौरवगाथा का साक्षी है, जिन्होंने 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत माता को अंग्रेजी गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। अगस्त क्रांति, जिसे भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय है, जिसने देश के कोने-कोने में आजादी की ज्वाला को प्रज्वलित किया। इस आंदोलन ने न केवल नालंदा के हिलसा, बल्कि पूरे बिहार और भारत के नौजवानों में स्वतंत्रता की ललक को और मजबूत किया।

1942 में, जब महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का नारा दिया, लाखों भारतीयों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। गांधी जी समेत कई बड़े क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया गया और ब्रिटिश शासन ने दमनात्मक नीतियों को और कठोर कर दिया। इसके बावजूद, देश के युवाओं में स्वतंत्रता की ललक कम नहीं हुई। हिलसा के नौजवान भी इस आह्वान से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। राम बाबू हाई स्कूल के मैदान में सैकड़ों क्रांतिकारी युवाओं ने एकत्र होकर हिलसा थाना पर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया।

हिलसा थाना पर तिरंगा फहराने के लिए उत्साही युवा जैसे ही आगे बढ़े, अंग्रेजी सिपाहियों ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस क्रूर हमले में दर्जनों युवा शहीद हो गए। हिलसा थाना के सामने उस स्थल पर, जहां युवाओं की लाशें पड़ी थीं, अंग्रेजों ने पेट्रोल छिड़ककर उन्हें जलाने का क्रूरतापूर्ण कृत्य किया। इस अमानवीय घटना ने हिलसा के इतिहास को एक दुखद, लेकिन गौरवपूर्ण पृष्ठ प्रदान किया।

इन शहीदों की याद में हिलसा थाना के ठीक सामने एक शहीद स्मारक बनाया गया है, जहां 11 वीर सपूतों के नाम अंकित हैं। ये अमर शहीद बालगोबिंद ठाकुर (ग्राम-कछियावां, 25 वर्ष ), नारायण पांडेय (ग्राम-कछियावां, 18 वर्ष ), भीमसेन महतो (ग्राम-इंदौत, 20 वर्ष ), सदाशिव महतो (ग्राम-बदनपुरा, 20 वर्ष ), केवल महतो (ग्राम-बनवारा, 32 वर्ष ), सुखाड़ी चौधरी (ग्राम-हिलसा, 18 वर्ष), दुखन राम (ग्राम-गन्नीपुर, 21 वर्ष), रामचरित्र दुसाध (ग्राम-बनवारीपुर, 18 वर्ष), शिवजी राम (ग्राम-हिलसा, 25 वर्ष), हरिनंदन सिंह (ग्राम-मलावा, 19 वर्ष), भोला सिंह (ग्राम-बनवारा, 21 वर्ष) हैं।

हालांकि अगस्त क्रांति की लहर केवल हिलसा तक सीमित नहीं थी। पटना में भी छात्रों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रदर्शन किए और सचिवालय पर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया। 11 अगस्त 1942 को इस प्रयास के दौरान सात छात्र शहीद हो गए।

इनमें उमाकांत प्रसाद सिंह, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार, देवीपद चौधरी, राजेंद्र सिंह और राय गोविंद सिंह शामिल थे। ये सभी ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के छात्र थे, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहार में स्वतंत्रता संग्राम की लहर अपने चरम पर थी। करीब 15 हजार  से अधिक लोग बंदी बनाए गए। 7 हजार से ज्यादा को सजा दी गई और 134 बिहारियों ने अपनी जान की कुर्बानी दी। बिहार के इन शहीदों ने अपने खून से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को अमर कर दिया।

हिलसा का शहीद स्मारक और पटना का सचिवालय गोलीकांड हमें उन वीर सपूतों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर हमें आजाद भारत में सांस लेने का अवसर दिया। आज हम उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिनके बलिदान ने भारत को स्वतंत्रता की राह दिखाई। हिलसा के शहीद स्मारक पर अंकित 11 नाम और पटना के सात शहीदों की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि देश के लिए समर्पण और बलिदान की भावना कितनी महत्वपूर्ण है।

नालंदा दर्पण की ओर से हिलसा के शहीदों और देश के सभी स्वतंत्रता सेनानियों को शत-शत नमन।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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