कन्हैयागंज झूला क्लस्टरः 11 साल से जंग खा रही सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का महत्वाकांक्षी ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहे जाने वाले कन्हैयागंज झूला क्लस्टर की हालत देखकर किसी का भी दिल दहल जाएगा। कन्हैयागंज क्षेत्र में चार करोड़ 56 लाख रुपये की लागत से स्थापित होने वाले इस अत्याधुनिक झूला क्लस्टर को शुरू हुए 11 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज तक यहां झूला निर्माण का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका।

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Kanhaiyaganj Jhula Cluster CM’s dream project has been languishing for 11 years

मुख्यमंत्री सूक्ष्म व लघु क्लस्टर योजना के तहत उद्योग विभाग द्वारा 2015 में स्वीकृति मिलने के बावजूद यह परियोजना बदहाली की शिकार होकर धूल फांक रही है। एक समय देश-विदेश में अपनी अलग पहचान कायम करने वाला कन्हैयागंज का झूला उद्योग अब सरकारी उदासीनता और सदस्यों की लापरवाही का शिकार बन गया है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विजन से प्रेरित यह क्लस्टर योजना बिहार के पारंपरिक उद्योगों को आधुनिक बनाने का एक बड़ा कदम था। 2015 में उद्योग विभाग ने कन्हैयागंज झूला क्लस्टर को मंजूरी दी। योजना के तहत कुल चार करोड़ 56 लाख रुपये की लागत में अत्याधुनिक तकनीक से लैस मशीनें और अन्य सामग्रियां खरीदी जानी थीं।

विडंबना यह है कि अब तक तीन करोड़ 70 लाख रुपये तीन किस्तों में खर्च हो चुके हैं। इन पैसों से खरीदी गई मशीनें और उपकरण क्लस्टर परिसर में पड़े-पड़े धूल फांक रहे हैं और जंग लगने लगी है। ये मशीनें कभी झूला निर्माण की रफ्तार बढ़ाने वाली थीं, लेकिन आज ये सरकारी खजाने की बर्बादी का जीता-जागता सबूत बन गई हैं।

कन्हैयागंज का झूला उद्योग सदियों से स्थानीय कारीगरों की आजीविका का सहारा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों में भी इन झूलों की मांग रहती थी। लेकिन आधुनिकीकरण की कमी और बाजार की चुनौतियों ने इस उद्योग को कमजोर कर दिया। क्लस्टर योजना इसी कमी को दूर करने के लिए लाई गई थी, ताकि पारंपरिक कारीगरी को आधुनिक मशीनों का सहारा मिले और सैकड़ों बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिले। लेकिन 11 साल बाद भी यह सपना अधर में लटका हुआ है।

योजना के प्रावधानों के अनुसार कुल लागत का 90 प्रतिशत यानी चार करोड़ एक लाख रुपये राज्य सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि क्लस्टर के सदस्यों द्वारा दी जानी है। क्लस्टर में शामिल 35 सदस्यों को कुल 45 लाख रुपये का अंशदान जमा करना था, जो स्पेशल पर्पज वेहिकल (एसपीवी) के माध्यम से किया जाना था।

लेकिन अफसोस की बात यह है कि उद्योग विभाग के बार-बार पत्राचार और याद दिलाने के बावजूद सदस्यों ने यह राशि जमा नहीं की। इसकी वजह से परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है।

सदस्यों की यह लापरवाही न केवल सरकारी धन की बर्बादी का कारण बन रही है, बल्कि स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसरों को भी छीन रही है। क्लस्टर शुरू होने पर सैकड़ों कारीगरों और युवाओं को सीधे रोजगार मिलने की उम्मीद थी। लेकिन अंशदान की राशि जमा न होने से पूरी योजना ठप पड़ी हुई है।

क्लस्टर परिसर का नजारा देखकर किसी को भी दुख होता है। करोड़ों रुपये की मशीनें खुले आसमान के नीचे पड़ी हुई हैं। बारिश, धूप और नमी के कारण इन पर जंग लग चुकी है। ये मशीनें अत्याधुनिक तकनीक से लैस थीं, जो झूला निर्माण को तेज और गुणवत्तापूर्ण बनाने वाली थीं। लेकिन रखरखाव की कमी ने इन्हें कबाड़ में बदल दिया है।

क्लस्टर को शुरू करने में कई तकनीकी बाधाएं भी आ रही हैं। सबसे बड़ा मुद्दा बिजली कनेक्शन का है। मशीनें चलाने के लिए एक हजार केवीए ट्रांसफॉर्मर की जरूरत है, जिसके लिए विभाग को 26 लाख रुपये की सुरक्षा राशि जमा करनी थी। लेकिन यह राशि जमा न होने से बिजली कनेक्शन नहीं हो सका। जिला उद्योग केंद्र ने ट्रांसफॉर्मर खरीदने के लिए तीन बार टेंडर निकाला, लेकिन क्लस्टर सदस्यों की भागीदारी न होने से यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

इसके अलावा भूमि आवंटन, बुनियादी ढांचे का विकास और अन्य प्रशासनिक मुद्दे भी परियोजना को लटका रहे हैं। उद्योग विभाग के अधिकारी हालांकि आश्वासन दे रहे हैं कि क्लस्टर को शीघ्र शुरू करने के प्रयास जारी हैं।

जिला उद्योग केंद्र, नालंदा के महाप्रबंधक सचिन कुमार कहते हैं कि झूला क्लस्टर को शीघ्र चालू करने के लिए हम प्रत्यनशील हैं। महाप्रबंधक के निर्देशन में बीते एक नवंबर को बैठक की गई थी। इसमें आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए सकारात्मक कार्य किया जा रहा है। क्लस्टर शुरू हो जाने से सैकड़ों बेरोजगार युवकों को रोजगार मिल सकेगा।

अधिकारी ट्रांसफॉर्मर और बिजली कनेक्शन के मुद्दे को मुख्य बाधा मानते हैं। वे कहते हैं कि सदस्यों से अंशदान जमा करवाने और टेंडर प्रक्रिया को पूरा करने पर फोकस किया जा रहा है।

बहरहाल कन्हैयागंज झूला क्लस्टर की यह कहानी बिहार के विकास मॉडल पर सवाल खड़े करती है। मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट 11 साल से जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। सरकारी धन खर्च हो चुका है, मशीनें बेकार पड़ी हैं, लेकिन उद्योग अभी भी सपनों में है। स्थानीय कारीगर और युवा निराश हैं। अगर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो यह परियोजना हमेशा के लिए दफन हो जाएगी।

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