इतिहास के पन्नों में सिमटी ज्ञानशाला उदंतपुरी के अवशेष

नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिले के कण-कण में इतिहास दबा है। यहां की धरा अद्भुत व निराली है। जिसके गर्भ में न जाने कितने इतिहास छिपे हैं। कभी बिहार शरीफ शहर उंदतपुरी के नाम से जाना जाता था, जो ज्ञान का विशाल व बेमिशाल कुंज था।

The remains of Gyanshala Udantpuri shrunk in the pages of history 2सन् 730-740 ई. में पाल वंश के संस्थापक गोपाल ने इस विश्वविद्यालय की बुनियाद रखी थी। विश्वविद्यालय का बड़ा क्षेत्रफल था। बाद के शासकों ने अनुदान देकर शिक्षा के इस कुंज को सिचित करने का काम किया।

हालांकि इस विश्वविद्यालय के संदर्भ में इतिहासकारों के बीच बड़ा विभेद है। इस विश्वविद्यालय के केन्द्र तक की अब तक स्पष्ट जानकारी नहीं है। कुछ गढ़पर को तो कोई बड़ी पहाड़ी को उदंतपुरी का केंद्र मानते हैं।

The remains of Gyanshala Udantpuri shrunk in the pages of history 3कई बार विदेशों से अध्ययन को यहां टीम आई है। लेकिन हर बार निराशा साथ ले गई। टीम की मांग रही कि सरकार को इस अवशेष को आर्कोलाजिकल विभाग को सौंप देना चाहिए, ताकि इतिहास जीवित रह सके।

सच कहा जाए तो सरकार की अनदेखी का ही परिणाम है कि आज उंदतपुरी इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गया।

इतिहासकार बताते हैं कि उदंतपुरी तथा नालंदा विश्वविद्यालय का स्थापना काल समान रहा, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में बौद्ध धर्म के अलग-अलग मत के मानने वाले लोग थे।

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तिब्बती रिकार्ड के अनुसार यहां भी छात्रों की संख्या दस हजार से अधिक थी। शिक्षा के क्षेत्र में इसकी बढ़ती हुई ख्याति के कारण बख्तियार खिलजी ने 1197 ई. में इसे अपना शिकार बनाया और बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया।

जानकारों के मुताबिक उदंतपुरी ज्ञान की शाला थी। जिसने 7वीं शताब्दी में अपने ज्ञान से पुरी दुनिया को आलोकित किया।

हालांकि इस विश्वविद्यालय के बारे में काफी कन्ट्राडिक्शन है। पांच सौ के करीब बौद्ध भिक्षुओं के रहने खाने-पीने की यहां व्यवस्था थी। चारों तरफ हरियाली तथा बहती हुई नदी यहां की शान थी।

कई इतिहासकार तथा पुरातत्ववेता यहां आए, लेकिन मायूसी लेकर गएं क्योंकि उदंतपुरी के टीले पर एक बड़ी आबादी निवास करती है। जिसे दूसरे जगह निर्वासित किया जाना सरकार के बूते के बाहर है।

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