
इस्लामपुर (नालंदा दर्पण)। कभी आँगन और पूजा की थाली तक सीमित रहने वाली तुलसी आज किसानों के खेतों में खुशहाली की कहानी लिख रही है। पारंपरिक खेती से जूझ रहे किसानों के लिए तुलसी अब सिर्फ धार्मिक या औषधीय पौधा नहीं, बल्कि एक लाभकारी कृषि व्यवसाय बनकर उभरी है। बिहार में इसकी खेती ने किसानों की आय बढ़ाई है और बाजार में तुलसी के तेल की बढ़ती मांग ने कई चेहरों पर मुस्कान लौटा दी है।

मगही पान अनुसंधान केंद्र के मेडिसिनल प्लांट विशेषज्ञ डॉ. शिवनाथ दास बताते हैं कि जो किसान धान-गेहूं जैसी परंपरागत खेती से ऊब चुके हैं, उनके लिए तुलसी एक बेहतर विकल्प है। पूजा-पाठ से लेकर औषधीय और कॉस्मेटिक उद्योग तक इसकी मांग देश-विदेश में तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि तुलसी का तेल अब किसानों के लिए नकदी फसल के रूप में पहचान बना रहा है।
इस बदलाव की एक जीवंत मिसाल हैं मोतिहारी जिले के संग्रामपुर प्रखंड की डुमरिया पंचायत के किसान धीरज मिश्रा। उन्होंने परंपरागत खेती छोड़कर तुलसी को अपनाया और इसे अपनी पहचान बना लिया। जहाँ अधिकांश किसान मौसम, लागत और बाजार की अनिश्चितता से परेशान रहते हैं, वहीं धीरज मिश्रा ने दूरदर्शिता से खेती को मुनाफे का सौदा बना दिया।
धीरज मिश्रा बताते हैं कि तुलसी की खेती पारंपरिक फसलों से बिल्कुल अलग है। इसमें न तो ज्यादा लागत लगती है और न ही अत्यधिक मेहनत। एक बार पौध तैयार कर देने के बाद साल में तीन बार कटाई (हार्वेस्टिंग) की जा सकती है। पानी के अलावा कोई बड़ा खर्च नहीं है। यही वजह है कि सीमित जमीन और संसाधन वाले किसान भी कम जोखिम में अच्छी आमदनी कमा रहे हैं।
धीरज मिश्रा ने लगभग 11 एकड़ में तुलसी की खेती की। मौजूदा समय में तुलसी के तेल का बाजार भाव 2000 से 2500 रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गया है। एक एकड़ से औसतन 35 से 45 लीटर तेल निकल रहा है, जिससे किसानों को 80 से 90 हजार रुपये प्रति एकड़ तक का लाभ हो रहा है।
धीरज बताते हैं कि पहले यही भाव मेंथा (पुदीना) के तेल में देखने को मिलता था, लेकिन इस बार बाजार में तुलसी के तेल में जबरदस्त तेजी आई है।
पान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से अब उनके इलाके में एक दर्जन से अधिक किसान तुलसी की खेती कर रहे हैं। वैज्ञानिक डॉ. शिवनाथ दास के अनुसार बिहार की मिट्टी और जलवायु तुलसी के लिए बेहद अनुकूल है। तुलसी सामान्य मिट्टी में भी उग जाती है, लेकिन भुरभुरी या दोमट मिट्टी और बेहतर जलनिकासी वाली जमीन इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यह जल्दी बढ़ने वाली फसल है और इसे खास देखभाल की जरूरत भी नहीं पड़ती।
भारतीय संस्कृति में तुलसी का विशेष स्थान रहा है। लगभग हर घर में तुलसी का पौधा मिलता है, जिसकी पूजा की जाती है। लेकिन आज वही तुलसी किसानों के लिए आय का मजबूत जरिया बन रही है। आयुर्वेद में तुलसी को ‘जीवनदायिनी औषधि’ कहा गया है। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि तुलसी के पत्तों में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर को वायरल, बैक्टीरिया, सूजन, एलर्जी, फेफड़े और मेटाबोलिज़्म से जुड़ी बीमारियों से बचाने में सहायक हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार तुलसी सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि इसमें मौजूद 50 से अधिक बायोएक्टिव कंपाउंड्स इसे सुपर-औषधि बनाते हैं। यही कारण है कि दवा, आयुर्वेद, परफ्यूम और कॉस्मेटिक उद्योग में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, बिहार में तुलसी की खेती अब एक नवाचारी और लाभदायक कृषि मॉडल के रूप में उभर रही है। यह न सिर्फ किसानों को बेहतर आय दे रही है, बल्कि औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती के जरिए कृषि को नई दिशा भी दिखा रही है। पूजा की थाली से निकलकर खेतों तक पहुँची तुलसी आज सचमुच किसानों के लिए ‘हरे सोने’ से कम नहीं है।







