पीने का पानी चोरी के आरोपी को रिहा किया करते बोले जेजेबी जज- ‘सिर्फ बच्चे पैदा न करें, बल्कि…’

नालंदा दर्पण डेस्क। बाल-किशोर अपराध के प्रति सुधारात्मक फैसलों के लिए देश-दुनिया चर्चित हो रहे नालंदा जिला किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी मानवेन्द्र मिश्र ने एक और उल्लेखनीय फैसला दिया है।

उन्होंने पीने का पानी के चोरी के आरोपी किशोर को न केवल दोषमुक्त कर दिया, बल्कि किशोर की पढ़ाई लिखाई नहीं कराने के लिए उसके माता-पिता को भी फटकार लगायी। आरोपी किशोर आठ भाई बहन हैं और माता-पिता समेत परिवार में कुल दस लोग हैं और सभी के सभी निरक्षर हैं।

सुनवाई के दौरान किशोर पर चोरी का कोई आरोप साबित नहीं हो सका था। उस किशोर को अंगूठा लगाते देख जेजेबी जज विफर पड़े और अपने फैसले में वैसे माता-पिता को लेकर कड़ी टिप्पणी की है, जो अपने पारिवारिक सामर्थ्य के अंधाधुन बच्चे तो पैदा करते हैं, लेकिन उनकी परवरिश सही ढंग से नहीं करते, उनके खान-पान और पढ़ाई लिखाई पर ध्यान नहीं देते हैं।

उन्होंने अपने फैसले में सवाल उठाते हुए कहा कि क्या माता-पिता का दायित्व सिर्फ बच्चे पैदा करना है या उनका पालन-पोषण, देखभाल, संरक्षण, शिक्षा और उचित संवर्द्धन का नैतिक दायित्व भी है?

जेजेबी में किशोर के पिता ने भी कहा कि हम कितने बच्चों पर ख्याल रखें। बच्चों का पेट कैसे चले, इसी में लगे रहते हैं। परिवार में अधिक बच्चे होने के वजह से यह बच्चा उपेक्षा का शिकार है और उम्र के अनुसार शारीरिक, मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है।

जेजेबी जज ने किशोर को दोषमुक्त करते हुए यह भी कहा है कि विधि विरूद्ध इस किशोर को इस अपराध के लिए किसी भी प्रकार की सजा दिये जाने से ज्यादा जरूरत इसके देखभाल, संरक्षण और मदद की है। इस किशोर को पठन-पाठन या कौशल विकास कार्यक्रम से जोड़ने की जरुरत है।

जेजेबी जज ने फैसले में आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है कि शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है। सभी सरकारी स्कूल में नि:शुल्क शिक्षा के साथ-साथ मध्याह्न भोजन, पोशाक राशि, अल्पसंख्यक, दलित, महिला छात्रवृत्ति, मुफ्त किताब, साइकिल आदि दिया जा रहा है। इतनी सुविधा के बाद भी बच्चे का निरक्षर रहने के लिए अभिभावक जिम्मेवार हैं।

उन्होंने चाणक्य नीति का जिक्र करते हुए कहा गया है कि ऐसे माता-पिता जो बच्चों को शिक्षित नहीं करते हैं, वह शत्रु के समान हैं। क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति कभी भी विद्वानों की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुंड में बगुले की तरह होती है।

दरअसल, इसलामपुर थाना क्षेत्र में एक किशोर इधर-उधर भटक रहा था। इसी दौरान प्यास लगने पर एक व्यक्ति के घर के दरवाजे के अंदर जाकर पानी पीने लगा। उसी दौरान उक्त व्यक्ति पूछताछ करने लगा। डरकर वह भागने लगा तो उक्त व्यक्ति ने उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया।

किशोर के पास से चुरायी हुई या अपराध में प्रयोग किये जाने वाला कोई भी वस्तु बरामद नहीं हुआ। इसकी पुष्टि सीसीटीवी फुटेज भी हुआ।

पूछताछ में किशोर ने अदालत को बताया कि उसके पिता मजदूर हैं और कबाड़ी का काम करते हैं। आर्थिक स्थिति को देखते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा किशोर को वकील की सुविधा उपलब्ध करायी गयी।

जज मानवेन्द्र मिश्र ने फैसला सुनाते हुए पुलिस को फटकार लगाते हुए मामला दर्ज कराने वाले सूचक को हिदायत दी कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस को प्राथमिकी दर्ज नहीं करनी चाहिए।

बिहार किशोर न्याय अधिनियम 2017 के नियम 8 में ऐसा निर्देश है। इसे जेनरल डायरी में दर्ज करना चाहिए था। वहीं सूचक को भी बच्चे की मानसिक स्थिति को देखते हुए पुलिस को सौंपने और प्राथमिकी दर्ज करने के लिए आवेदन देने के वजाय डांट-फटकार कर व समझाकर अपने स्तर से छोड़ देना चाहिए था।

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