राजगीर को राजगृह करने का प्रस्ताव पारित, DM से मांगी रिपोर्ट

राजगीर (नालंदा दर्पण)। बिहार की ऐतिहासिक नगरी राजगीर कभी मगध साम्राज्य की राजधानी के रूप में राजगृह के नाम से विख्यात थी। अब स्थानीय जनता, सामाजिक संगठनों और धार्मिक नेताओं द्वारा राजगीर का नाम बदलकर राजगृह करने की मांग को समर्थन किया जा रहा है।

इस मांग को बल देने के लिए नगर परिषद राजगीर ने एक प्रस्ताव पारित किया है और अनुमंडल पदाधिकारी ने भी इसकी आधिकारिक अनुशंसा की है। मुख्यमंत्री सचिवालय ने मुख्य सचिव और नालंदा के जिला पदाधिकारी से इस संबंध में रिपोर्ट मांगी है। इससे स्पष्ट है कि यह मुद्दा अब राज्य सरकार के संज्ञान में है।

बता दें कि राजगृह का नाम प्राचीन ग्रंथों जैसे महाभारत, बौद्ध त्रिपिटक और जैन आगमों में बार-बार उल्लेखित है। यह वही पावन भूमि है जहाँ मगध के शक्तिशाली सम्राट जरासंध, बिंबिसार और अजातशत्रु ने शासन किया।

भगवान बुद्ध ने यहीं धर्मचक्र प्रवर्तन किया और भगवान महावीर ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया। प्रथम बौद्ध संगीति और त्रिपिटक की रचना भी इसी धरती पर हुई। जैन और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए राजगृह एक तीर्थस्थल है और यह हिन्दू, सिख और इस्लाम के अनुयायियों के लिए भी पवित्र नगरी रही है।

स्थानीय प्रशासन ने इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। राजगीर के गंगाजी जलाशय को गंगाजी राजगृह जलाशय और सर्किट हाउस को राजगृह अतिथि गृह का नाम दिया गया है। यह दर्शाता है कि प्रशासन इस मांग को गंभीरता से ले रहा है। विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने भी इस पहल का समर्थन किया है।

जैन समुदाय भी इस मांग के साथ मजबूती से खड़ा है। वीरायतन की प्रमुख आचार्य चंदना जी महाराज ने इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कदम बताया। श्वेताम्बर जैन कोठी प्रबंध समिति के मंत्री रंजन कुमार जैन ने कहा कि राजगृह नाम हमारी प्राचीन विरासत को सम्मान देने का एक अवसर है।

नाम परिवर्तन की मांग को समर्थन देने वालों का मानना है कि यह कदम राजगीर को वैश्विक धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर और प्रमुखता से स्थापित करेगा। राजगीर पहले से ही बौद्ध, जैन और हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य है।

पर्यटन सलाहकार डॉ कौलेश कुमार के अनुसार राजगृह नाम न केवल ऐतिहासिक सटीकता को दर्शाता है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को भी आकर्षित करेगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

जनता की भावनाओं और प्रशासनिक पहल को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकार इस मांग पर शीघ्र निर्णय लेगी। यदि मुख्यमंत्री और मंत्रीमंडल परिषद से स्वीकृति मिलती है तो यह बिहार की सांस्कृतिक विरासत को संजोने और वैश्विक स्तर पर उसकी पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।

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