जरा इस महिला मुखिया के गांव की हालत देखिए
कतरीसराय (नालंदा दर्पण)। कतरीसराय प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत बरीठ गांव में विकास की तस्वीर कुछ और ही बयान करती है। यहाँ की कच्ची सड़कें, कीचड़ भरी गलियाँ और नालियों की बदहाली न केवल ग्रामीणों के दैनिक जीवन को कठिन बना रही हैं, बल्कि सरकार और स्थानीय प्रशासन की कागजी घोषणाओं की पोल भी खोल रही हैं।
आजादी के 78 वर्षों बाद भी यह गाँव बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और ग्रामीणों की शिकायतें अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के आश्वासनों के पिटारे में दबकर रह जाती हैं।
बरीठ गांव, जो मैरा बरीठ पंचायत का हिस्सा है, लगभग 3 हजार की आबादी वाला एक बड़ा गाँव है। इस पंचायत की कुल आबादी करीब 15 हजार है। फिर भी यहाँ की अधिकांश गलियाँ कच्ची हैं। बारिश के मौसम में ये गलियाँ कीचड़ से लबालब हो जाती हैं, जिससे ग्रामीणों का चलना-फिरना दूभर हो जाता है।
वार्ड नंबर 11 के निवासी रंजीत कुमार कहते हैं कि हमारी गलियाँ ऐसी हैं कि पैदल चलना भी मुश्किल है। बच्चों को स्कूल जाने और बुजुर्गों को घर से बाहर निकलने में दिक्कत होती है।
स्थानीय निवासी बिहारी महतो ने बताया कि गलियों में गंदगी और नालियों की बदहाली के कारण मच्छरों और बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। हम बार-बार शिकायत करते हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल वादे करते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि बरीठ गांव को जानबूझकर मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया है। यहाँ के करीब 1000 घरों में अधिकांश लोग दलित, महादलि, और पिछड़े समुदायों से हैं।
द्वारिका प्रसाद कहते हैं कि जब पंचायत का मुखिया ही अपने वार्ड की उपेक्षा करता हो तो हम किससे उम्मीद करें? सरकार नेशनल हाईवे और बड़े प्रोजेक्ट्स की बात करती है, लेकिन हमारे गाँव की छोटी-छोटी जरूरतें अनदेखी हो रही हैं।
हैरानी की बात यह है कि यह गाँव पंचायत के मुखिया नीतू कुमारी का अपना गाँव है। फिर भी यहाँ की समस्याएँ अनसुलझी हैं। ग्रामीण अजय कुमार ने गुस्से में कहा कि हमारी गलियाँ कच्ची हैं, नालियाँ जाम हैं और गंदगी चारों तरफ फैली है। यह विकास नहीं उपेक्षा का प्रतीक है।
सरकार का दावा है कि वह अधिक से अधिक गाँवों को शहरों से जोड़ने और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन बरीठ गांव की स्थिति इस दावे की हकीकत बयान करती है। यहाँ न तो पक्की सड़कें हैं, न ही स्वच्छ नालियाँ और न ही गलियों की नियमित सफाई होती है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आवाज़ को नजरअंदाज करना स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का परम कर्तव्य बन गया है।
इस संबंध में पंचायत की मुखिया नीतू कुमारी ने कहा कि मैं बरीठ गांव की समस्याओं से पूरी तरह अवगत हूँ। हम इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत हैं, और जल्द ही पक्की गलियों और नालियों का निर्माण शुरू होगा।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे वादे उन्हें वर्षों से सुनने को मिल रहे हैं, लेकिन धरातल पर कोई बदलाव नहीं दिखता।
बरीठ गांव के लोग पक्की गलियों, स्वच्छ नालियों और नियमित सफाई की माँग कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये बुनियादी सुविधाएँ न केवल उनके जीवन को आसान बनाएँगी, बल्कि गाँव में स्वच्छता और स्वास्थ्य के स्तर को भी सुधारेंगी। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि अगर उनकी माँगें जल्द पूरी नहीं हुईं तो वे इस मुद्दे को और बड़े स्तर पर उठाने के लिए मजबूर होंगे।
बहरहाल, बरीठ गांव की स्थिति नालंदा जिले के कई अन्य गाँवों की कहानी को दर्शाती है, जहाँ विकास केवल कागजों तक सीमित है। क्या यह उपेक्षा जानबूझकर है या यह प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है? यह सवाल ग्रामीणों के मन में बार-बार उठता है। अब देखना यह है कि स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गाँव की समस्याओं को कब तक और कितनी गंभीरता से लेते हैं।





