नगरनौसा में मौत का रास्ता बना जुगाड़ पुल, सांसद-विधायक को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश
नगरनौसा के कछियावा गांव में डोढ़ नदी पर पुल निर्माण नहीं होने से ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। कई हादसों और मौतों के बावजूद आज भी लोग अस्थायी जुगाड़ पुल से आवागमन कर रहे हैं।

नगरनौसा (नालंदा दर्पण)। विकास के तमाम दावों के बीच नगरनौसा प्रखंड की कछियावा पंचायत का कछियावा गांव आज भी एक ऐसे पुल का इंतजार कर रहा है, जिसका वादा पिछले करीब तीन दशकों से लगातार किया जाता रहा है। डोढ़ नदी पर स्थायी पुल नहीं बनने के कारण लगभग 5,500 की आबादी वाले इस गांव के लोग आज भी लोहे के एंगल और स्थानीय संसाधनों से बनाए गए अस्थायी जुगाड़ पुल के सहारे अपनी जान जोखिम में डालकर आवागमन करने को मजबूर हैं।
करीब 700 घरों वाले इस गांव के लिए डोढ़ नदी केवल एक प्राकृतिक धारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ते ही यह अस्थायी पुल और अधिक खतरनाक हो जाता है। बावजूद इसके ग्रामीणों के पास नदी पार करने का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
ग्रामीण राजेंद्र गोप, बंगाली यादव, प्रमोद कुमार, पिंकू राम सहित वार्ड संख्या-4 के कई लोगों का कहना है कि यदि यहां स्थायी पुल का निर्माण हो जाए तो गांव के विकास की नई संभावनाएं खुल जाएंगी। नदी के दूसरी ओर पर्याप्त खाली जमीन उपलब्ध है, जहां भविष्य में लोग नए घर बनाकर बस सकते हैं। वर्तमान में गांव की बढ़ती आबादी के कारण आवासीय संकट भी गहराता जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार हरनौत विधानसभा क्षेत्र के विधायक हरिनारायण सिंह ने गांव पहुंचकर पुल निर्माण का आश्वासन दिया था। वहीं सांसद कौशलेंद्र कुमार ने गौरैया स्थान पर सीढ़ी निर्माण कराया और पुल बनवाने का भरोसा भी दिलाया था। लेकिन वर्षों बीतने के बावजूद पुल निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी।
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय पुल निर्माण प्रमुख मुद्दा बनता है, लेकिन मतदान समाप्त होते ही यह वादा भी अन्य घोषणाओं की तरह फाइलों में सिमट जाता है। लगातार मिल रहे आश्वासनों के बावजूद जमीन पर कोई काम शुरू नहीं होने से लोगों में जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी बढ़ रही है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि डोढ़ नदी पार करने के दौरान अब तक चार से पांच लोगों की मौत हो चुकी है। कई अन्य लोग दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल हुए हैं और कुछ के हाथ-पैर तक टूट चुके हैं। इसके बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
बरसात के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। नदी का पानी बढ़ने पर गौरैया स्थान की सीढ़ियां पूरी तरह जलमग्न हो जाती हैं। ऐसे समय में ग्रामीणों के लिए केवल जुगाड़ पुल ही सहारा बचता है, जिस पर हर कदम दुर्घटना का खतरा साथ लेकर चलता है।
इस गांव के अधिकांश किसानों की खेती डोढ़ नदी के दूसरी ओर स्थित खेतों में होती है। रोज किसानों, मजदूरों और महिलाओं को इसी अस्थायी पुल से होकर आना-जाना पड़ता है। पुल नहीं होने से खेती-किसानी प्रभावित होती है और बरसात के दौरान आर्थिक नुकसान भी बढ़ जाता है।
ग्रामीणों ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन, स्थानीय विधायक और सांसद से डोढ़ नदी पर अविलंब स्थायी पुल निर्माण की मांग की है। उनका कहना है कि यह पुल केवल आवागमन का साधन नहीं होगा, बल्कि गांव के विकास, किसानों की सुविधा, लोगों की सुरक्षा और भविष्य में गांव के विस्तार का आधार भी बनेगा।
ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। उनका कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि डोढ़ नदी पर पुल निर्माण का कार्य धरातल पर शुरू होता हुआ देखना है।






