
नगरनौसा (नालंदा दर्पण)। सरकार गांव-गांव तक पक्की सड़क और बेहतर आवागमन सुविधा पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन नगरनौसा प्रखंड की कैला पंचायत में यह दावा जमीनी हकीकत से दूर नजर आता है। कैला पंचायत सरकार भवन तक पहुंचने वाला करीब दो हजार फीट रास्ता आज भी कच्चा है। बरसात में यही रास्ता कीचड़ और जलजमाव के कारण ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार प्रेमनविगहा-सैयरापर सड़क से मिल्की खंधा होते हुए कैला पंचायत सरकार भवन तक जाने वाला रास्ता लंबे समय से पक्की सड़क की बाट जोह रहा है। बारिश के बाद रास्ते में जगह-जगह कीचड़ और पानी जमा हो जाता है। ऐसे में दोपहिया और चारपहिया वाहनों की आवाजाही तो मुश्किल होती ही है, पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं रहता।
इसी रास्ते से 14 गांवों की आवाजाही
कैला पंचायत सरकार भवन में पंचायत से जुड़े कार्यों के लिए करीब 14 गांवों के ग्रामीणों का नियमित आना-जाना होता है। इनमें कुड़बापर, हरगोपालपुर, दुधैला, मखदुमपुर, रामचक, गढ़ियापर, प्रेमनविगहा, कैला, खरजमा, मानसिंगपुर, महमदपुर, तीना, उस्मानपुर और लोदीपुर के ग्रामीण शामिल हैं।
इतना ही नहीं पंचायत सरकार भवन के आसपास किसानों से जुड़ी गतिविधियां भी होती हैं। यहां पैक्स कार्यालय के अलावा लाखों रुपये की लागत से निर्मित 1000 मीट्रिक टन क्षमता का अनाज गोदाम भी मौजूद है। ग्रामीणों का कहना है कि जब मुख्य पहुंच पथ ही बदहाल रहेगा तो पंचायत भवन, पैक्स कार्यालय और अनाज गोदाम तक सुगम आवागमन कैसे सुनिश्चित होगा?
15 वर्षों से मिल रहा सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों के मुताबिक पंचायत सरकार भवन में पिछले करीब 15 वर्षों से पंचायत कार्यालय का संचालन हो रहा है, लेकिन भवन तक पहुंचने वाला रास्ता आज तक पक्का नहीं हो सका। सड़क निर्माण की मांग को लेकर स्थानीय विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री तक कई बार आवेदन दिए जाने का दावा ग्रामीणों ने किया है। इसके बावजूद अब तक सड़क निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
कैला पंचायत के उप मुखिया जितेंद्र प्रसाद ने भी इस रास्ते की समस्या को गंभीर बताया। उनका कहना है कि बरसात के दिनों में जलजमाव और कीचड़ के कारण ग्रामीणों को काफी परेशानी होती है तथा वाहनों की आवाजाही प्रभावित रहती है।
ग्रामीण बोले- अब आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए
ग्रामीणों नवल किशोर प्रसाद, छोटे प्रसाद, अनिल कुमार, सहेन्द्र कुमार, उपेंद्र कुमार, अरविंद कुमार, इंद्रजीत कुमार और विजेंद्र प्रसाद का कहना है कि सड़क को लेकर वे वर्षों से आश्वासन सुनते आ रहे हैं। चुनाव के समय नेताओं का गांव में आना-जाना बढ़ता है। उस दौरान सड़क निर्माण का भरोसा दिलाया जाता है और कई बार यह भी कहा जाता है कि सड़क स्वीकृत हो चुकी है तथा चुनाव के बाद काम शुरू हो जाएगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा फिर पीछे छूट जाता है और सड़क निर्माण का मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। उनका कहना है कि 15 वर्षों के आश्वासन के बाद अब उन्हें घोषणा या वादा नहीं, बल्कि धरातल पर पक्की सड़क चाहिए।
ग्रामीणों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि आगामी चुनाव से पहले सड़क निर्माण की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई और फिर से केवल आश्वासन दिए गए, तो वे अपने मताधिकार के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करने पर विचार करेंगे।
अब सवाल सिर्फ एक कच्चे रास्ते का नहीं, बल्कि उन 14 गांवों के हजारों ग्रामीणों की रोजमर्रा की आवाजाही, पंचायत सेवाओं तक पहुंच और सरकारी संसाधनों के बेहतर उपयोग का है। ग्रामीणों की नजर इस बात पर टिकी है कि वर्षों से चली आ रही इस समस्या का समाधान आखिर कब जमीन पर दिखाई देगा।
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