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लोदीपुर में ‘विकास’ की खुदाई! 5.60 लाख की नाली योजना में अनियमितता, हो जांच

नगरनौसा (नालंदा दर्पण)। गांवों के विकास के नाम पर योजनाएं बनती हैं, प्राक्कलन तैयार होता है, सरकारी धन स्वीकृत होता है और फिर शुरू होता है ‘विकास का अपना देसी मॉडल’। नतीजा यह कि जिस रास्ते से ग्रामीणों को चलना था, वही रास्ता महीनों तक जेसीबी की खुदाई के बाद जंगल में तब्दील हो जाए तो इसे व्यवस्था की विडंबना कहें या विकास का नया प्रयोग?

नगरनौसा प्रखंड की रामपुर पंचायत के लोदीपुर गांव, वार्ड संख्या-6 में करीब 5.60 लाख रुपये की प्रस्तावित लागत वाली जल निकासी योजना को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर अनियमितताओं की शिकायत की है।

ग्रामीणों का कहना है कि लगभग तीन माह पूर्व गांव के मुख्य निकास मार्ग के ठीक बीचोंबीच जेसीबी से गहरी खुदाई कर दी गई और उसे लंबे समय तक यूं ही छोड़ दिया गया। देखते-देखते खुदाई वाले हिस्से में झाड़-जंगल उग आए और ग्रामीणों ने उस रास्ते से गुजरना तक छोड़ दिया।

बीडीओ के संज्ञान के बाद रातों-रात जागा विकास

मामले की सूचना प्रखंड विकास पदाधिकारी को दी गई। ग्रामीणों के अनुसार बीडीओ के निर्देश के बाद अचानक रातों-रात जेसीबी लगाकर काम शुरू कर दिया गया। पहले से गिराए गए होम पाइप को कथित तौर पर जैसे-तैसे डालकर मिट्टी से भर दिया गया। वहीं शेष हिस्से में सड़क के बीचोंबीच खुली ईंट की नाली बनाने का काम शुरू किया गया है। यहीं से ग्रामीणों के सवालों की फेहरिस्त भी लंबी होती जा रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि नाली निर्माण में भी मानकों की अनदेखी की जा रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि नाली की सतह में कथित तौर पर वही पुरानी ईंटें लगाई जा रही हैं, जो जेसीबी से खुदाई के दौरान पुरानी नाली से निकली थीं।

यानी विकास योजना का गणित कुछ ऐसा नजर आ रहा है। पुरानी नाली तोड़िए, पुरानी ईंट निकालिए, फिर उन्हीं ईंटों से नई नाली बनाइए और विकास का हिसाब पूरा कर दीजिए!

योजना स्थल पर बोर्ड तक नहीं, आखिर किस बात का गोपनीय विकास?

ग्रामीणों की शिकायत का एक अहम बिंदु यह भी है कि कार्यस्थल पर अब तक कोई योजना बोर्ड नहीं लगाया गया है। ऐसे में ग्रामीणों को यह जानने का अवसर ही नहीं मिल रहा कि योजना की स्वीकृत राशि कितनी है, काम की लंबाई-चौड़ाई क्या है, किस विभाग या एजेंसी के माध्यम से काम हो रहा है और निर्माण की निर्धारित गुणवत्ता क्या है।

सरकारी योजनाओं में सूचना सार्वजनिक करने की व्यवस्था इसलिए होती है ताकि गांव का आम आदमी भी पूछ सके कि कितने रुपये आए, कितना काम होना है और कितना काम हुआ? लेकिन यहां बोर्ड ही न हो तो सवाल पूछने का अधिकार भी जैसे ‘बोर्ड’ के साथ गायब हो जाता है।

जेई का तर्क और ग्रामीणों का सीधा सवाल

मामले में जेई संजय का कथित तर्क है कि आगे जेसीबी नहीं जा सकती, इसलिए मुखिया द्वारा ईंट की नाली बनाई जा रही है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल इससे भी सीधा है कि जब उसी रास्ते में जेसीबी से गहरी खुदाई हो सकती है तो पाइप डालने के लिए जेसीबी क्यों नहीं जा सकती?

यदि तकनीकी रूप से पाइप बिछाने का कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प है तो उसकी जानकारी ग्रामीणों को दी जानी चाहिए। और यदि मौजूदा निर्माण प्राक्कलन के अनुरूप है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने में आखिर परेशानी क्या है?

ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि शिकायत करने पर जेई की ओर से यह कहा गया कि योजना को जहां तक काम हुआ है, वहीं तक छोड़कर बंद कर दिया जाएगा। इस कथन को ग्रामीणों ने चेतावनी के तौर पर लिया है। हालांकि, इस संबंध में संबंधित अधिकारी का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है।

250 मनरेगा मजदूरों के भुगतान का दावा, फिर योजना में मजदूर क्यों नहीं?

मामले का सबसे बड़ा सवाल शायद यही है। ग्रामीणों के अनुसार रामपुर पंचायत में करीब 250 मनरेगा मजदूरों का नियमित भुगतान हो रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि पंचायत में पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध हैं तो जल निकासी जैसी योजना में जहां संभव हो, स्थानीय मजदूरों से काम क्यों नहीं कराया जा रहा?

पंचायत स्तर पर पंचायत सेवक, ग्राम सेवक, रोजगार सेवक और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी इसी वजह से सवालों के घेरे में बताई जा रही है।

ग्रामीणों का तंज है कि अगर मजदूर सिर्फ कागजों पर रोजगार पा रहे हैं और धरातल पर जेसीबी ही विकास का सबसे बड़ा मजदूर है, तो फिर ग्रामीण रोजगार योजना की असली तस्वीर आखिर कहां दिखाई देगी?

शिकायत डीएम तक पहुंची, जांच का इंतजार

मामले को लेकर ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से शिकायत की है। इसकी सूचना प्रखंड विकास पदाधिकारी और अनुमंडल पदाधिकारी को भी दिए जाने की बात कही गई है। शिकायत पत्र पर वार्ड सदस्य, महिला समूह की अध्यक्ष सहित प्रभावित ग्रामीणों के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है।

ग्रामीण चाहते हैं कि अधिकारी कार्यालय में बैठकर कागजों की जांच करने के बजाय स्वयं स्थल पर पहुंचकर निर्माण की स्थिति देखें और प्राक्कलन, मापी-पुस्तिका, भुगतान, सामग्री की गुणवत्ता तथा वास्तविक कार्य की जांच करें।

मुखिया समर्थकों के हंगामे पर भी सवाल

ग्रामीणों का आरोप है कि मुखिया के प्रभाव से गांव के एक-दो ऐसे लोगों को सामने लाकर विरोध का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनका कथित तौर पर नाली की समस्या से सीधा सरोकार नहीं है। यही वजह है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि विरोध वास्तविक ग्रामीण असहमति है या किसी पक्ष का प्रभाव।

अब असली परीक्षा कागजों की नहीं, मौके की है इस पूरे प्रकरण में सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि किसने किस पर आरोप लगाया। असली सवाल है कि 5.60 लाख रुपये की प्रस्तावित योजना में जमीन पर आखिर हुआ कितना काम और वह स्वीकृत प्राक्कलन के मुताबिक हुआ या नहीं?

जांच के लिए कई सवाल बिल्कुल स्पष्ट हैं-

  • योजना की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति क्या है?
  • स्वीकृत प्राक्कलन में पाइप और नाली का क्या प्रावधान है?
  • मौके पर कितनी लंबाई में पाइप बिछाया गया?
  • खुली नाली की चौड़ाई, गहराई और निर्माण सामग्री मानक के अनुरूप है या नहीं?
  • पुरानी ईंटों के पुनः इस्तेमाल का प्रावधान है या नहीं?
  • योजना स्थल पर सूचना पट क्यों नहीं लगाया गया?
  • भुगतान किस मद में और किस आधार पर किया गया?
  • मापी-पुस्तिका में दर्ज कार्य और धरातल पर मौजूद कार्य में कितना अंतर है?

इन सवालों का जवाब किसी बयान से नहीं, मौके की जांच और सरकारी अभिलेखों के मिलान से मिलेगा।

फिलहाल, लोदीपुर के ग्रामीणों की निगाह अब अधिकारियों पर है। क्योंकि विकास की असली पहचान यह नहीं कि फाइल में योजना पूरी दिख रही है या नहीं; असली सवाल यह है कि जिस रास्ते से जनता गुजरती है, क्या वह रास्ता जनता के लिए बचा भी है या विकास की खुदाई में कहीं दब चुका है?

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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