
राजगीर (नालंदा दर्पण)। सरकारी योजनाओं में अक्सर एक सवाल पूछा जाता है कि काम कितना हुआ? मेयार गांव का जलाशय शायद इससे थोड़ा अलग सवाल पूछ रहा है कि काम हुआ भी कितना?
राजगीर प्रखंड के मेयार गांव में 14.87 एकड़ में फैला जलाशय किसानों के लिए सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। करीब दो करोड़ रुपये की लागत से लघु जल संसाधन विभाग की हर खेत तक सिंचाई का पानी योजना के तहत इसकी उड़ाही और जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि करोड़ों की लागत के बावजूद जलाशय का बड़ा हिस्सा अब भी गाद और मिट्टी से भरा पड़ा है और सावन के महीने में भी जलाशय पानी का इंतजार कर रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार जलाशय के कुल 14.87 एकड़ क्षेत्रफल में से लगभग सात एकड़ हिस्से में ही खुदाई और उड़ाही की गयी है। शेष हिस्से में अपेक्षित काम नहीं होने का आरोप लगाया गया है। सवाल यह है कि यदि जलाशय का आधा हिस्सा अपनी पुरानी हालत में रह गया, तो फिर उसकी जलधारण क्षमता कितनी बढ़ेगी और हर खेत तक पानी आखिर किस रास्ते से पहुंचेगा?
सात फीट का प्रावधान, जमीन पर तीन फीट की खुदाई का दावा
ग्रामीणों ने केवल काम के क्षेत्रफल पर ही सवाल नहीं उठाया है, बल्कि खुदाई की गहराई को लेकर भी गंभीर आरोप लगाये हैं। उनका कहना है कि स्वीकृत प्राक्कलन में करीब सात फीट तक मिट्टी की खुदाई-उड़ाही का प्रावधान बताया गया है, जबकि स्थल पर लगभग तीन फीट तक ही खुदाई हुई है।
अगर ग्रामीणों का यह दावा जांच में सही पाया जाता है तो मामला सिर्फ आधी उड़ाही का नहीं रहेगा। तब यह भी देखना होगा कि स्वीकृत प्राक्कलन में कितनी मिट्टी निकालने का हिसाब था और जमीन पर वास्तव में कितनी मिट्टी निकली। यानी असली परीक्षा अब फाइलों की नहीं, फीते और पैमाइश की है।
जलाशय सूखा, सवालों में करोड़ों का पानी
ग्रामीणों की चिंता सरकारी राशि तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि जलाशय की पूरी और वैज्ञानिक तरीके से उड़ाही नहीं होने पर बरसाती पानी का पर्याप्त संचयन नहीं हो सकेगा। इसका सीधा असर खरीफ और रबी दोनों मौसमों में सिंचाई पर पड़ सकता है।
किसानों के मुताबिक, जलाशय में पर्याप्त पानी रहने से आसपास के कुओं, चापाकलों, नलकूपों और भू-जल स्रोतों को भी रिचार्ज मिलने की संभावना रहती है। ऐसे में जलाशय का जीर्णोद्धार केवल मिट्टी हटाने का काम नहीं, बल्कि क्षेत्र की दीर्घकालीन सिंचाई और जल-सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
फिलहाल स्थिति यह है कि जिस जलाशय की क्षमता बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं, वह सावन में भी सूखा दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों का तंज है कि तालाब में पानी भले न आया हो, लेकिन योजना पर सवालों की बाढ़ जरूर आ गयी है।
मिट्टी कहां गयी, यह भी जांच का विषय
ग्रामीणों ने जलाशय से निकाली गयी मिट्टी के उठाव, परिवहन और कथित बिक्री की भी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि बड़ी मात्रा में मिट्टी निकालने का प्रावधान था तो उसकी वास्तविक मात्रा, उठाव और निस्तारण का रिकॉर्ड भी सामने आना चाहिए।
इसीलिए ग्रामीणों ने बिहार के जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव और नालंदा की जिलाधिकारी उदिता सिंह को आवेदन देकर उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित करने की मांग की है।
उनकी मांग है कि टीम मौके पर पहुंचकर जलाशय की पैमाइश करे और स्वीकृत प्राक्कलन, मापी पुस्तिका तथा स्थल पर हुए वास्तविक कार्य का मिलान कराये। साथ ही खुदाई की गहराई, निकाली गयी मिट्टी की मात्रा और कार्य की गुणवत्ता का तकनीकी आकलन किया जाये।
विभाग बोला- नियमानुसार हुआ काम, अतिक्रमण भी बड़ी समस्या
वहीं लघु जल संसाधन विभाग, बिहारशरीफ के सहायक अभियंता सुनील कुमार ने ग्रामीणों के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मेयार जलाशय की खुदाई-उड़ाही विभागीय नियमों के अनुसार करायी गयी है।
उनका कहना है कि जलाशय की जमीन पर ग्रामीणों द्वारा बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है। जलाशय में बिजली के 13 पोल भी गाड़े गये हैं। अतिक्रमण हटाने के लिए राजगीर के अंचलाधिकारी को पत्र लिखा गया है। ग्रामीणों की ओर से कोई आरोप लगाया गया है तो उसकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
अब कागज बनाम जमीन की जांच जरूरी
बताया गया है कि जीर्णोद्धार कार्य 14 मार्च 2026 से शुरू हुआ है और इसकी समय-सीमा मार्च 2027 तक बतायी गयी है। ऐसे में अभी कार्य अवधि बाकी है। यही वजह है कि ग्रामीण चाहते हैं कि काम पूरा होने का इंतजार करने के बजाय अभी स्थल निरीक्षण और तकनीकी पैमाइश करा ली जाये।
क्योंकि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि शुरुआत में जमीन पर कितनी खुदाई थी और बाद में कितनी हुई। अभी जांच होगी तो मापी पुस्तिका, प्राक्कलन और स्थल की वास्तविक स्थिति का मिलान आसानी से किया जा सकता है।
मेयार जलाशय का मामला आखिरकार एक बड़े सवाल पर आकर टिकता है कि दो करोड़ रुपये की योजना का मूल्यांकन कागज पर निकली मिट्टी से होगा या जमीन पर बची मिट्टी से? किसानों को फिलहाल किसी रिपोर्ट में दर्ज सिंचाई क्षमता नहीं, बल्कि खेत तक पहुंचने वाला पानी चाहिए।
इसलिए प्रशासन के लिए बेहतर होगा कि वह फाइलों की यात्रा छोड़कर एक बार जलाशय तक पहुंचे, फीता लेकर पैमाइश करे और देखे कि तालाब कितना खुदा है, कितना बचा है और पानी के लिए वास्तव में कितनी जगह बनी है।
अगर आरोप गलत हैं तो मौके की जांच उन्हें साफ कर देगी। और अगर आरोप सही हैं तो अधूरे काम को पूरा कराने तथा जिम्मेदारी तय करने का रास्ता भी वहीं से निकलेगा।
फिलहाल मेयार का जलाशय यही कहता नजर आ रहा है कि मेरे जीर्णोद्धार की कहानी कागज पर पूरी हो सकती है, लेकिन पानी के लिए अभी जमीन पर बहुत काम बाकी है।






