कतरीसराय (नालंदा दर्पण)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में एक सरकारी स्कूल में हुई मामला ने स्थानीय समुदाय और शिक्षा क्षेत्र में गंभीर चर्चा को जन्म दिया है। इस घटना में नालंदा विधायक एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार के जन्मदिन को स्कूल के बच्चों के साथ धूमधाम से मनाया गया। इस आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों का ध्यान खींचा, बल्कि यह सवाल भी उठाया कि क्या स्कूल जैसे शैक्षणिक स्थानों का उपयोग राजनेताओं की छवि चमकाने के लिए किया जाना उचित है?
मायापुर गांव के एक सरकारी स्कूल में पूर्व सरपंच सचिन कुमार के नेतृत्व में यह आयोजन किया गया। इस दौरान स्कूल के बच्चों के साथ मिलकर विधायक के जन्मदिन पर केक काटा गया। आयोजन में जरूरतमंद बच्चों के बीच कॉपी, कलम और अन्य शैक्षिक सामग्री भी वितरित की गई। इस मौके पर राहुल कुमार, मनोज कुमार, निरज कुमार, अनुग्रह कुमार, रंजीत कुमार, अमर कुमार सहित स्कूल के सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं उपस्थित थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह आयोजन स्कूल के पढ़ाई के समय में आयोजित किया गया। जिसके कारण कक्षाओं में व्यवधान उत्पन्न हुआ। मंत्री के इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। जिसने इस मुद्दे को और तूल दे दिया।
इस आयोजन ने कई गंभीर सवालों को जन्म दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्कूल जैसे शैक्षणिक संस्थानों को राजनेताओं के प्रचार के लिए इस्तेमाल करना उचित है? स्कूल बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य को संवारने का स्थान है, न कि किसी की छवि चमकाने का मंच। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आयोजनों से बच्चों की पढ़ाई में बाधा उत्पन्न होती है और यह उनके समय का दुरुपयोग है। बच्चों को प्रचार का हथियार बनाना है।
एक स्थानीय निवासी ने कहा कि हमारे बच्चों का भविष्य स्कूल में पढ़ाई से बनता है, न कि नेताओं के जन्मदिन मनाने से। अगर कोई मदद करनी है तो बिना पढ़ाई का समय बर्बाद किए बच्चों के लिए किताबें, स्कूल की सुविधाएं या बुनियादी ढांचा बेहतर किया जाए।
दरअसल आज के दौर में सोशल मीडिया नेताओं और उनके समर्थकों के लिए अपनी छवि को जनता के बीच चमकाने का एक बड़ा माध्यम बन गया है। इस आयोजन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए। स्थानीय पत्रकारों को प्रकाशन के लिए भेजे गए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जन्मदिन मनाना नहीं, बल्कि प्रचार करना भी था।
एक शिक्षा कार्यकर्ता ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्कूलों को प्रचार का अड्डा बनाया जा रहा है। बच्चों को कॉपी-कलम देना अच्छी बात है, लेकिन इसे पढ़ाई के समय में करना और फिर सोशल मीडिया पर प्रचार करना गलत है। यह बच्चों के साथ-साथ शिक्षा प्रणाली का भी अपमान है।
इस आयोजन में स्कूल के शिक्षकों और कर्मचारियों की मौजूदगी ने भी सवाल खड़े किए हैं। क्या स्कूल प्रशासन को इस तरह के आयोजनों की अनुमति देनी चाहिए? विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल प्रशासन को ऐसी गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए, जो पढ़ाई के समय में बाधा डालती हों।
एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमें इस आयोजन में शामिल होने के लिए दबाव डाला गया था। हम नहीं चाहते थे कि बच्चों की पढ़ाई बाधित हो, लेकिन स्थानीय नेताओं के दबाव के कारण हमें शामिल होना पड़ा।
वेशक यह घटना नालंदा जिले में शिक्षा प्रणाली और राजनेताओं की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाती है। शिक्षा विभाग को इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। साथ ही स्कूलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पढ़ाई का समय केवल शिक्षा के लिए उपयोग हो।





