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BPSC शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच पंचायत शिक्षकों से! शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल

नालंदा दर्पण डेस्क। संवैधानिक संस्था बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) से चयनित शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच यदि पंचायत और प्रखंड स्तर के शिक्षकों से कराई जाए तो सवाल उठना लाज़मी है। नालंदा जिले में सामने आई यही तस्वीर अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखी बहस को जन्म दे रही है।

जानकारी के अनुसार, बीपीएससी द्वारा चयनित 5386 शिक्षकों के शैक्षणिक एवं प्रशैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच की जिम्मेदारी प्रखंड–पंचायत शिक्षकों को सौंप दी गई है। यह वही जांच है, जिसमें बीएड, एमएड, स्नातकोत्तर, टीईटी और एसटीईटी जैसे उच्च स्तरीय और तकनीकी दस्तावेज शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जांच न केवल अनुभव बल्कि विधिवत प्रशिक्षण और स्पष्ट अधिकार क्षेत्र की मांग करती है।

रहुई प्रखंड स्थित बीआरसी में प्रखंड शिक्षक अबू हरेरा और पंचायत शिक्षक शैलेंद्र कुमार इस जांच प्रक्रिया में लगे हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि नियमों के मुताबिक ऐसे संवेदनशील कार्यों के लिए अधिकृत अधिकारियों या प्रशिक्षित टीम का होना आवश्यक माना जाता है। यही वजह है कि अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या प्रखंड और पंचायत शिक्षक इस स्तर की जांच के लिए अधिकृत हैं?

और भी हैरानी की बात यह है कि संबंधित प्रखंड के बीईओ का प्रभार डीपीओ (स्थापना) के पास होने के बावजूद यह पूरी प्रक्रिया अलग ही दिशा में चल रही है। जानकारों का कहना है कि इससे न केवल प्रशासनिक भ्रम पैदा होता है, बल्कि भविष्य में विवाद और कानूनी उलझनें भी बढ़ सकती हैं।

सूत्रों के अनुसार 3 जनवरी से दो प्रतियों में वॉटरमार्क युक्त प्रमाण पत्रों की जांच शुरू कर दी गई है। सभी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे विज्ञापन के समय जमा किए गए सत्यापित दस्तावेजों को दो अलग-अलग फोल्डरों में प्रस्तुत करें। हालांकि जांच की पारदर्शिता और वैधानिक मजबूती को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।

बीपीएससी से चयनित कई शिक्षक इस प्रक्रिया को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमने परीक्षा और चयन की पूरी प्रक्रिया बीपीएससी के माध्यम से पूरी की है। अब प्रमाण पत्रों की जांच ऐसे स्तर पर होना, जहां अधिकार और प्रशिक्षण स्पष्ट नहीं है, चिंता बढ़ाता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि संवैधानिक संस्था से चयनित शिक्षकों की जांच यदि इस तरह की गई तो इसकी विश्वसनीयता पर असर कौन झेलेगा? क्या शिक्षा विभाग इस प्रक्रिया की समीक्षा करेगा या फिर यह मामला यूं ही चलता रहेगा?

फिलहाल, नालंदा में चल रही यह जांच न केवल शिक्षकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि शिक्षा विभाग की जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी बड़ा सवालिया निशान लगा रही है।

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