CBI की लापरवाही से पेपर लीक सरगना संजीव मुखिया को मिली जमानत

हिलसा (नालंदा दर्पण)। क्या एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की विश्वसनीयता को खतरे में डालने वाला अभियुक्त इतनी आसानी से जमानत पा सकता है? केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से नीट 2024 प्रश्नपत्र लीक मामले में समय पर आरोप पत्र दाखिल न करने के कारण पटना की विशेष सीबीआई अदालत ने मुख्य अभियुक्त संजीव मुखिया को जमानत दे दी। यह निर्णय न केवल जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मामले में न्याय की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

बता दें कि 5 मई 2024 को देशभर में आयोजित नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) 2024 के दौरान अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। राजधानी पटना के शास्त्री नगर थाना प्रभारी अमर कुमार ने कुछ संदिग्धों को गिरफ्तार किया और इस मामले में प्राथमिकी (कांड संख्या 358/2024) दर्ज की गई। शुरुआत में यह मामला आर्थिक अपराध इकाई को सौंपा गया। लेकिन प्रश्नपत्र लीक की गंभीरता सामने आने पर केंद्र सरकार ने जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया।

सीबीआई ने 23 जून 2024 को अपनी प्राथमिकी (आरसी 224/2024) दर्ज की और जांच शुरू की। अब तक इस मामले में 49 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 45 अभियुक्तों के खिलाफ विभिन्न चरणों में आरोप पत्र दाखिल किए गए हैं। लेकिन मास्टरमाइंड संजीव मुखिया के खिलाफ समय पर आरोप पत्र दाखिल न करने का खामियाजा सीबीआई को भुगतना पड़ा।

विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश सुनील कुमार सिंह की अदालत में संजीव मुखिया की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि वह 90 दिनों से न्यायिक हिरासत में है, लेकिन सीबीआई ने उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के तहत यदि 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं होता तो अभियुक्त को जमानत का अधिकार मिल जाता है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मुखिया को जमानत दे दी।  यहां सवाल उठता है: क्या सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी से ऐसी चूक की उम्मीद की जा सकती है? क्या यह लापरवाही जांच की गंभीरता को कमजोर नहीं करती?

क्योंकि संजीव मुखिया का नाम केवल नीट 2024 पेपर लीक मामले तक सीमित नहीं है। वह पहले भी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक के मामलों में अभियुक्त रहा है। लंबे समय तक पुलिस की पहुंच से बाहर रहने के बाद पटना पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था। सीबीआई ने इस मामले में उसकी संलिप्तता की पुष्टि की थी और विशेष अदालत ने 28 अप्रैल 2025 को उसकी पेशी के लिए वारंट जारी किया था। 1 मई 2025 से वह इस मामले में हिरासत में था।

लेकिन क्या एक ऐसे व्यक्ति को, जिस पर इतने गंभीर आरोप हैं, इतनी आसानी से जमानत मिलना उचित है? क्या यह निर्णय उन लाखों छात्रों के साथ अन्याय नहीं करता, जो नीट जैसी परीक्षाओं के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं?

सीबीआई ने इस मामले में अब तक 13 जुलाई 2024 को मूल आरोप पत्र 19 सितंबर 2024 को, पहला पूरक आरोप पत्र, 7 अक्टूबर 2024 को दूसरा पूरक आरोप पत्र, 7 नवंबर 2024 को तीसरा पूरक आरोप पत्र और 22 नवंबर 2024 को चौथा पूरक आरोप पत्र दाखिल किया है। इनमें 45 अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। मामले में सरकारी कर्मचारियों की संलिप्तता पाए जाने के बाद भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धाराएं जोड़ी गईं, जिसके कारण मामला विशेष सीबीआई अदालत संख्या दो में स्थानांतरित हुआ।

फिर भी संजीव मुखिया जैसे प्रमुख अभियुक्त के खिलाफ समय पर कार्रवाई न करना कई सवाल उठाता है। क्या सीबीआई के पास सबूतों की कमी थी? या फिर जांच में प्राथमिकता का अभाव था?

नीट जैसी परीक्षाएं बिहार के लाखों छात्रों के लिए मेडिकल क्षेत्र में भविष्य बनाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होती हैं। प्रश्नपत्र लीक जैसे मामले न केवल इन छात्रों के सपनों पर चोट पहुंचाते हैं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाते हैं। नालंदा कभी विश्व-प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र था, आज इस तरह की घटनाओं से प्रभावित है। क्या यह समय नहीं है कि हम अपनी जांच एजेंसियों और शिक्षा प्रणाली से जवाबदेही की मांग करें?

क्योंकि संजीव मुखिया को जमानत मिलना एक घटना मात्र नहीं है। यह हमारी जांच और न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को दर्शाता है। क्या हम ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए और सख्त कदम उठा सकते हैं? क्या नीट जैसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए नए तंत्र की आवश्यकता है?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

अन्य समाचार