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    कुर्मी बहुल चंडी प्रखंड के पंचायतों में फिर जातीय गोलबंदी तय करेंगे चुनाव नतीजे

    बिहार में चुनाव किसी स्तर पर हो, उसमें मतदान जातीय या वर्गीय स्तर ही होता है। लोकसभा, विधानसभा चुनाव की तरह पंचायत स्तरीय चुनाव में भी जातीय गणित ही अधिक मायने रखते हैं। उनका विकास, लूट, भ्रष्टाचार, अपराध, योग्यता, ईमानदारी, कर्मठता आदि से कोई वास्ता नहीं होता है.....

    नालंदा दर्पण डेस्क। चंडी प्रखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए शनिवार को चुनाव प्रचार थम गया है। यह मूलतः कुर्मी बहुल क्षेत्र है और यहाँ हार-जीत के फैसले में इस जाति की भूमिका प्रायः पंचायत क्षेत्रों में निर्णायक मानी जाती है।

    अब 15 नबंबर को यहां वार्ड सदस्य, पंच, सरपंच, मुखिया, पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य के लिए मतदान होना है।

    इस बार चंडी प्रखंड के 13 पंचायत में चुनाव होंगे। प्रखंड के सरथा पंचायत को हरनौत में विलोपित कर दिया गया है।जबकि चंडी पंचायत और भगवानपुर पंचायत के कुछ गांव को नगर पंचायत के रूप में गठित किया गया है।

    भगवानपुर पंचायत की जगह अमरौरा के रूप में नया पंचायत का गठन किया गया है। 15 नबंबर को होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जातिय गोलबंदी हो रहीं है तो वहीं प्रखंड के तीन अनारक्षित सीटो पर सबकी निगाहें रहेंगी।

    इसका कारण यह है कि इन पंचायतों में कुर्मी बाहुल्य होने के बाबजूद उनमें फूट दिख रही है। पिछले चुनाव में अन्य जातियों की गोलबंदी की वजह से तुलसीगढ़ पंचायत में कुर्मी बाहुल्य का वर्चस्व टूट गया था। इस बार भी वही नाजुक स्थिति बन रही है।

    तुलसीगढ़ पंचायत में चंडी के गुंजरचक और कोरूत गांव को जोड़ देने से मुकाबला काफ़ी आर पार का दिख रहा है।

    तुलसीगढ़ पंचायत में अगर कुर्मी वोटर बिखरा हुआ दिखाई दे रहा है। यहां कुर्मी उम्मीदवार के रूप में तीन प्रत्याशी हैं जो‌ खुद त्रिकोणीय मुकाबला बनाएं हुए है।

    ऐसे में निवर्तमान सवर्ण मुखिया को लाभ मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो आनेवाले समय में तुलसीगढ़ पंचायत में कुर्मी मुखिया का टोटा पड़ जाएगा।

    वहीं माधोपुर पंचायत में भी कुर्मी मुखिया का वर्चस्व इस बार खतरे में दिख रहा है। सवर्ण उम्मीदवार यहां भी दो कुर्मी उम्मीदवार जिनमें एक निवर्तमान मुखिया हैं उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं।

    माधोपुर पंचायत में बदलाव की राजनीति चल रहीं है। लेकिन इस बदलाव में माधोपुर के वैश्य वोटर काफी निर्णायक साबित होने वाला है। उनका पलड़ा जिधर झुका उधर मुखिया बनाने से कोई रोक नहीं सकता है।

    माधोपुर पंचायत की खासियत रही है कि अंतिम समय में जिसकी हवा रही मतदाता भी उधर ही झुक जाते हैं। वैसे कुर्मी वर्चस्व बचाना है तो यहां भी कुर्मी मतदाताओं को किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में  खड़ा निर्णय लेना होगा।

    चंडी प्रखंड का नरसंडा पंचायत भी संदेह के घेरे में हैं। यहां राजपूत मतदाताओं की गोलबंदी ने मुखिया प्रत्याशी की नींद हराम कर दी है।

    यहां से निवर्तमान दिवंगत मुखिया की पत्नी चुनाव मैदान में हैं। लेकिन उन्हें सहानूभूति वोट कितना मिल पाता है, फिलहाल बताना संभव‌ नहीं है। अगर यहां गैर कुर्मी मतदाता गोलबंद नहीं हुए तो इसका फायदा कुर्मी उम्मीदवार को सकता है।

    फिलहाल चंडी प्रखंड में सिर्फ एक सवर्ण मुखिया हैं।ऐसे में देखना दिलचस्प होता है कि वह सीट जाती है या फिर उनकी संख्या में इजाफा होता है।

     

     

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