नालंदा विधानसभा: कांग्रेस हिलाएगा जेडीयू का किला या जनसुराज बनेगी नई ताकत?
नालंदा दर्पण डेस्क | रामवतार | मुकेश भारतीय | 01 नवंबर 2025 | बिहार की राजनीतिक धरती पर नालंदा विधानसभा हमेशा से ही एक ज्वालामुखी रही है। यहां पुरानी दुश्मनियां भड़कती हैं। जातीय समीकरण उलट-पुलट होते हैं और हर चुनाव में इतिहास के पन्ने नया मोड़ लेते हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में यह सीट फिर से हॉटसीट बन चुकी है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह प्रभाव क्षेत्र में स्थित नालंदा सीट से जेडीयू के कद्दावर नेता और मंत्री श्रवण कुमार सात बार की लगातार जीत का रिकॉर्ड कायम रखे हुए हैं। लेकिन इस बार वे कांग्रेस के कौशलेंद्र कुमार उर्फ ‘छोटे मुखिया’ और जनसुराज की कुमारी पूनम सिन्हा की दोहरी चुनौती से जूझ रही है।
यहां कुल 10 उम्मीदवारों के बीच यह त्रिकोणीय जंग 6 नवंबर को चरम पर पहुंचेगी, जब 3,25,148 मतदाता जिनमें 47 प्रतिशत (1,53,479) महिलाएं हैं, अपना ‘किंग’ चुनेंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या श्रवण कुमार का किला अटल रहेगा या जनसुराज जैसी नई ताकत पुराने समीकरणों को तहस-नहस कर देगी? कांग्रेस के धारदार प्रत्याशी छोटे मुखिया इस बार किला ढाहने में सफल हो जाएंगे?
पुरानी दुश्मनी का नया अध्याय: 2015-2020 के आंकड़े बयां करते हैं तीखी टक्कर
नालंदा का चुनावी इतिहास किसी महाकाव्य से कम नहीं। कभी कांग्रेस का अभेद्य किला रहा इस क्षेत्र से 1980 के दशक में श्याम सुंदर सिंह ने यहां से तीन बार शानदार जीत हासिल की थी। लेकिन 1985 के बाद समीकरण बदल गए।
1995 में कुर्मी चेतना महारैली के बाद जेडीयू के श्रवण कुमार ने कमान संभाली और तब से यह सीट उनका निजी साम्राज्य बन गई। 1995 से 2020 तक श्रवण कुमार ने सात बार जीत दर्ज की, हर बार कुर्मी वोट बैंक को मजबूती से थामे हुए।
लेकिन असली रोमांच तो 2015 और 2020 के चुनावों में दिखा। 2015 में छोटे मुखिया ने बीजेपी के टिकट पर श्रवण कुमार को कड़ी टक्कर दी। केवल 3,200 वोटों के मामूली अंतर से हार गए। जेडीयू को 66,066 वोट मिले, जबकि बीजेपी को 62,866। यह अंतर इतना बारीक था कि राजनीतिक पंडितों ने इसे ‘नालंदा का संकट मोमेंट’ करार दिया।
फिर 2020 में छोटे मुखिया निर्दलीय उतरे और फिर से उपविजेता बने। श्रवण कुमार को 74,000 से अधिक वोट मिले, लेकिन अंतर घटकर महज 8,000 के आसपास रह गया। कुल वोटिंग 1,80,000 से ऊपर हुई, जिसमें कुर्मी (लगभग 35-40%) और अन्य पिछड़ी जातियों का दबदबा साफ दिखा।
इन आंकड़ों से साफ है कि छोटे मुखिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। खासकर बेन-जनकपुर जैसे श्रवण के गढ़ में, जहां स्थानीय नाराजगी (जमीन अतिक्रमण और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर) हवा में तैर रही है।
जातीय समीकरण: कुर्मी का किला, यादव-पासवान की हलचल
नालंदा का जातीय मोज़ेक किसी चित्रकार की कृति जैसा जटिल है। यहां कुर्मी वोटर सबसे बड़ी ताकत (35-40%) हैं, जो पारंपरिक रूप से जेडीयू के साथ हैं। लेकिन 2025 में हलचल साफ दिख रही है। कुर्मी चेतना आंदोलन के पुराने जख्म फिर से हरे हो रहे हैं और छोटे मुखिया जैसे उम्मीदवार इन्हें भुनाने की कोशिश में जुटे हैं। इसके अलावा पासवान (15-20%), यादव (10-15%), राजपूत, कोइरी और भूमिहार वोटर भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
जनसुराज की पूनम सिन्हा स्कूल बैग चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में हैं और जेडीयू के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने पर तुली हैं। कुल मिलाकर यह समीकरण 2020 के 55% वोटिंग प्रतिशत से ऊपर जाने की उम्मीद जगा रहा है और महिलाओं को ‘गेम चेंजर’ मानते हुए सभी दल उनका पूरा ध्यान बटोर रहे हैं।
स्थानीय मुद्दे: कुशासन और भ्रष्टाचार की आग में जल रहा नालंदा
चुनावी बहसें राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा स्थानीय दर्द पर केंद्रित हैं। सरकारी दफ्तरों में ‘बिना पैसा काम नहीं’ की शिकायतें आम हैं। नदी-पोखर और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण की जंग छिड़ी हुई है और पुलिस-प्रशासन की लापरवाही ने जनता का आक्रोश भड़का दिया है।
विपक्षी दल इसे श्रवण कुमार के गृह प्रखंड से जोड़कर प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस और जनसुराज के कार्यकर्ता घर-घर पहुंचकर कह रहे हैं कि मंत्री का क्षेत्र, फिर भी विकास का सूना। जेडीयू का जवाब है विकास के दावे। नई सड़कें, स्कूल और अस्पताल। लेकिन ग्रामीण चौपालों पर चर्चा यही है कि 6 नवंबर को वोट इस आक्रोश का इजहार बनेगा या नहीं। 389 मतदान केंद्रों पर 851 सर्विस वोटर पहले ही डाक से वोट डाल चुके हैं, जो शांतिपूर्ण प्रक्रिया का संकेत दे रहे हैं।
लेटेस्ट अपडेट: दिग्गजों की रैलियां, SVEEP का जोर
बहरहाल चुनावी सरगर्मियां चरम पर हैं। छठ पूजा के महापर्व के बाद ही मैदान गरम हो गया। 30 अक्टूबर को गृह मंत्री अमित शाह ने नालंदा में विशाल जनसभा को संबोधित किया, जहां उन्होंने NDA के ‘संकल्प पत्र’ को गरीबी उन्मूलन का हथियार बताया। उसी दिन राहुल गांधी बरबीघा और नालंदा में रैलियों के जरिए महागठबंधन को मजबूत करने पहुंचे। छोटे मुखिया के पक्ष में जोरदार अपील की।
दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग के SVEEP अभियान ने नालंदा को जागृत कर दिया है। 31 अक्टूबर को सोगरा+2 उच्च विद्यालय से प्रभात फेरी निकली, जहां आंगनवाड़ी सेविकाओं और जीविका दीदियों ने पहले मतदान, फिर जलपान के नारों से शहर गुंजायमान कर दिया।
सिलाव प्रखंड के पथलातिल्ला और बेन के खैरा गांव में जीविका दीदियों की रैलियां चलीं, जबकि रहुई के मुर्गियाचक में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने लो वोटर टर्नआउट वाले इलाकों में घर-घर जाकर प्रेरित किया। ये अभियान न सिर्फ 100% वोटिंग का लक्ष्य साध रहे हैं, बल्कि महिलाओं और युवाओं को केंद्र में ला रहे हैं।
जनता की परीक्षा, लोकतंत्र का उत्सव
बहरहाल नालंदा का यह चुनाव किसी एक उम्मीदवार की जंग नहीं है। यह जनता की ताकत, पुरानी दुश्मनी और नई आकांक्षाओं की परीक्षा है। श्रवण कुमार (तीर), छोटे मुखिया (पंजा), पूनम सिन्हा (स्कूल बैग) और अन्य प्रियदर्शी अशोक (हाथी, बसपा), अभि कुमार (विकास वंचित इंसान पार्टी) से लेकर रौशन कुमार (आजाद समाज पार्टी) सभी मैदान में हैं। लेकिन अंतिम फैसला 3.25 लाख वोटरों का होगा। क्या इतिहास दोहराएगा? या जनसुराज जैसी ताकत नया अध्याय लिखेगी? या कांग्रेस की नाव पर सवार के लिए अंततः सूर्योदय होगा?





