बिहार का पहला पांडुलिपि क्लस्टर केंद्र बना नालंदा महाविहार

राजगीर (नालंदा दर्पण)। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने वाला नव नालंदा महाविहार एक बार फिर इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की महत्वाकांक्षी योजना ‘ज्ञान भारतम्’ के अंतर्गत इसे बिहार का पहला पांडुलिपि क्लस्टर केंद्र घोषित किया गया है।

यह उपलब्धि न केवल बिहार के लिए गौरव की बात है, बल्कि देश की प्राचीन पांडुलिपि धरोहर को संरक्षित करने और डिजिटल युग में लाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगी। दिल्ली के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय आधुनिक कला दीर्घा (जयपुर हाउस) में आयोजित भव्य समारोह में इसकी औपचारिक घोषणा की गई, जहां देशभर से चुने गए 10 क्लस्टर केंद्रों और 7 स्वतंत्र केंद्रों के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए।

समारोह की शोभा बढ़ाते हुए केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने व्यक्तिगत रूप से नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल और संयुक्त सचिव समर नंदा भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

मंत्री शेखावत ने कहा कि नालंदा की ज्ञान परंपरा विश्व प्रसिद्ध है। प्रो. सिंह का योगदान बिहार की समृद्ध पांडुलिपि धरोहर को संरक्षित करने में मील का पत्थर साबित होगा। यह ‘ज्ञान भारतम्’ मिशन का एक मजबूत स्तंभ बनेगा।

समारोह में कुल 17 केंद्रों का चयन किया गया, जिनमें 10 क्लस्टर केंद्र क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक जिम्मेदारी निभाएंगे। नव नालंदा महाविहार को बिहार का एकमात्र क्लस्टर केंद्र बनाया जाना इसकी राष्ट्रीय स्तर की मान्यता को दर्शाता है।

प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि क्लस्टर केंद्र परियोजना की सर्वोच्च श्रेणी का हिस्सा होता है। यह न केवल अपनी संस्था की पांडुलिपियों तक सीमित रहता है, बल्कि पूरे क्षेत्र (यहां बिहार) की दुर्लभ पांडुलिपियों के खोज, संवर्धन, संरक्षण और डिजिटलीकरण की जिम्मेदारी उठाता है। इसके विपरीत, स्वतंत्र केंद्र केवल अपनी संस्थागत संपत्ति तक सीमित रहते हैं।

प्रो. सिंह ने कहा कि यह बिहार के लिए ऐतिहासिक है। हमारी जिम्मेदारी अब राज्य भर की प्राचीन पांडुलिपियों को बचाने की है, जो मठों, मंदिरों, निजी संग्रहों और पुरानी लाइब्रेरियों में बिखरी पड़ी हैं।

कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह इस परियोजना से प्रारंभिक चरण से ही जुड़े रहे हैं। दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय की कई उच्चस्तरीय बैठकों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। उनकी दूरदर्शिता और प्रयासों का ही नतीजा है कि नालंदा महाविहार को यह सम्मान मिला।

प्रो. सिंह ने कहा कि हम ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के हर उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारा लक्ष्य भारत को पुनः शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाना है। बिहार की पांडुलिपि परंपरा की खोज और डिजिटलीकरण में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

‘ज्ञान भारतम्’ योजना का मुख्य उद्देश्य देश की लाखों प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना है, ताकि ये आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहें और शोधकर्ताओं, छात्रों व सामान्य जन तक आसानी से पहुंच सकें। नव नालंदा महाविहार अब बिहार का पांडुलिपि हब बनेगा। यहां विशेष लैब, डिजिटलाइजेशन यूनिट और संरक्षण विशेषज्ञों की टीम तैयार की जाएगी।

प्रो. सिंह ने श्रेय देते हुए कहा कि यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के समर्पित शिक्षकों, शोधकर्ताओं और कर्मचारियों की टीम वर्क का परिणाम है। आने वाले समय में हम भारत सरकार के समक्ष एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करेंगे।

बता दें कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय ने कभी विश्व भर के विद्वानों को आकर्षित किया था। आज नव नालंदा महाविहार उसी परंपरा को डिजिटल युग में जीवंत कर रहा है। बिहार की पांडुलिपियां बौद्ध, जैन, हिंदू दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। इनके डिजिटलीकरण से न केवल संरक्षण होगा, बल्कि वैश्विक शोध में नई क्रांति आएगी।

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