निगरानी की सुस्त चाल पर सवालः 11 साल बाद भी अधूरी जांच, फर्जी शिक्षकों का मामला फिर गरमाया

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले में फर्जी शिक्षकों का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। हैरानी की बात यह है कि पटना हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद 11 वर्षों बाद भी फर्जी शिक्षकों की जांच पूरी नहीं हो सकी है। इस दौरान अधिकारी बदले, आदेश बदले, लेकिन व्यवस्था की सुस्ती के कारण सैकड़ों फर्जी शिक्षक स्कूलों में सेवा देते रहे।

वर्ष 2014 में पटना उच्च न्यायालय ने निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, बिहार (पटना) को निर्देश दिया था कि सभी नियोजित शिक्षकों के शैक्षणिक एवं प्रशैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच की जाए। इसके लिए एक विशेष पोर्टल भी बनाया गया, जिस पर शिक्षकों ने अपने प्रमाण पत्र अपलोड किए। लेकिन बड़ा पेंच तब फंसा, जब नियोजन इकाइयों के सदस्य सचिवों द्वारा इन प्रमाण पत्रों का अभिप्रमाणन ही नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि हजारों शिक्षकों की फाइलें आज भी अधूरी पड़ी हैं।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने अब एक बार फिर सभी ऐसे शिक्षकों को निर्देश दिया है कि वे अपने प्रमाण पत्रों को नियोजन इकाइयों से अभिप्रमाणित कराकर फोल्डर के रूप में जमा कराएं। अभिप्रमाणन के बाद ये फोल्डर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना को सौंपे जाएंगे। इस आदेश के बाद जिले में फर्जी शिक्षकों के बीच हड़कंप मच गया है।

जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) आनंद शंकर ने इस संबंध में सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को पत्र जारी कर निर्देश दिया है कि जिन शिक्षकों ने बिना अभिप्रमाणन के प्रमाण पत्र अपलोड किए थे, वे दोबारा सही और प्रमाणित दस्तावेज अपलोड करें।

नालंदा जिले में वर्ष 2006 से 2015 के बीच विभिन्न चरणों में करीब 9500 शिक्षक नियोजित हुए थे। इन सभी के प्रमाण पत्रों का सत्यापन निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहा है।

स्थिति और भी जटिल इसलिए है, क्योंकि वर्ष 2006 में नियुक्त कई शिक्षक अब लगभग 20 वर्षों की सेवा पूरी कर चुके हैं। वहीं बड़ी संख्या में शिक्षक सक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण कर विशिष्ट शिक्षक भी बन चुके हैं। यदि इनमें से कोई फर्जी निकलता है, तो यह न सिर्फ विभाग बल्कि सरकार के लिए भी गंभीर संकट खड़ा कर देगा।

फर्जी शिक्षकों पर कार्रवाई का सिलसिला नया नहीं है। वर्ष 2019 में लोकायुक्त ने 127 फर्जी शिक्षकों को बर्खास्त किया। वर्ष 2024 में एक ही शिक्षक पात्रता परीक्षा प्रमाण पत्र पर कार्य कर रहे 71 शिक्षक सेवा से हटाए गए।

वहीं वर्ष 2025 में इस्लामपुर प्रखंड के 15 स्कूलों में कार्यरत 36 फर्जी शिक्षक निष्कासित किए गए, जो सिर्फ कागजों पर मौजूद रहकर चुनाव जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी कर रहे थे। इसके अलावा करीब 55 अन्य शिक्षक भी फर्जी प्रमाण पत्र के आरोप में नौकरी गंवा चुके हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वर्षों से फर्जीवाड़ा उजागर हो रहा है, तो अब तक सभी मामलों का निर्णायक अंत क्यों नहीं हो सका? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर सिस्टम की कमजोर कड़ियां जानबूझकर मजबूत नहीं की जा रहीं?

फिलहाल, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की नई पहल से उम्मीद जगी है कि फर्जी शिक्षकों के इस लंबे अध्याय का अंत अब नजदीक हो। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यही है कि जब तक जांच समयबद्ध और सख्ती से पूरी नहीं होती, तब तक शिक्षा व्यवस्था पर उठे ये सवाल यूं ही बने रहेंगे।

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