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बदलता राजगीरः क्या वास्तव में अब भी मौजूद हैं 22 कुंड और 52 झरने ?

मलमास मेला से पहले गर्मजल स्रोतों की स्थिति को लेकर उठ रहे सवाल, प्रशासन से सत्यापन की मांग

राजगीर (नालंदा दर्पण)। बिहार के नालंदा ज़िले का प्राचीन और पौराणिक पर्यटन नगरी राजगीर आज फिर एक बड़ी चर्चा के केंद्र में है। यहाँ के 22 गरमजल कुंडों और 52 प्राकृतिक झरनों की पौराणिक संख्या और उनके वर्तमान भौतिक अस्तित्व को लेकर स्थानीय बुद्धिजीवी, धर्मप्रेमी और सामाजिक संगठनों ने गम्भीर सवाल उठाये हैं। मलमास मेला शुरू होने में अब सिर्फ कुछ ही महीने शेष हैं, लेकिन यह प्रश्न कि क्या राजगीर में आज भी वास्तविक रूप से 22 कुंड और 52 झरने मौजूद हैं? 

राजगीर की पहचान सदियों से आस-पास की पहाड़ियों में बहने वाले गरम जल से जुड़ी रही है। यहाँ के ब्रह्मकुंड (Brahma Kund) और अन्य गर्म जल स्रोत धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

पौराणिक मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने यहीं यज्ञ किया था और इसी दौरान स्मरणार्थ 22 कुंड और 52 धाराएँ (झरने) उत्पन्न हुईं जिनमें स्नान से धार्मिक पुण्य मिलता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मलमास मेला के दौरान इन कुंडों में स्नान का पुण्य प्रयागराज, अयोध्या जैसे तीर्थ स्थलों के स्नान के बराबर माना जाता है।

लेकिन अब स्थानीय लोगों की वजह बिल्कुल भिन्न है।  उनका कहना है कि समय के साथ कई कुंड और झरने सूख गये हैं या उनका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है, जिससे श्रद्धालु और पर्यटक वास्तविक स्थिति को समझने में भ्रमित हो रहे हैं।

कितने कुंड सक्रिय हैं, कितना पानी है? 

हाल की जनवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार राजगीर के ऐतिहासिक 22 कुंडों और 52 धाराओं में से कई अब पूरी तरह से सूख चुके हैं या अब केवल नाम मात्र के बचे हैं। राजगीर में स्थित गंगा-यमुना कुंड की दो धाराएँ, व्यास कुंड की एक धारा और मार्कण्डेय कुंड की एक धारा के पानी निकलना बंद हो चुका है, जबकि कई अन्य कुंड की धाराएँ मात्र बूंद-बूंद पानी दे रही हैं। कुछ कुंडों में तो पानी बिल्कुल नहीं है, जिससे श्रद्धालुओं में चिंता बढ़ी है कि मलमास स्नान और पूजा-पाठ के दौरान कठिनाई होगी।

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक ब्रह्मकुंड का जलस्तर भी सामान्य से कम है और बड़ी संख्या में धाराएँ केवल डल-डुल पानी दे रही हैं। इससे न केवल धार्मिक आयोजन प्रभावित हो सकते हैं बल्कि, राजगीर के पर्यटन पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है क्योंकि गरमजल कुंड विदेशी और देशी पर्यटकों के लिए एक प्रबल आकर्षण का केंद्र हैं।

सिंचाई विभाग और जल संसाधन विभाग की टीमों ने इस विषय में अध्ययन प्रारंभ कर दिया है, और कहा गया है कि जो धाराएँ बंद हुई हैं या सूख गयी हैं, उनके कारणों की जांच की जाएगी। अधिकारियों ने ये भी कहा कि लंबे समय से कुंडों की नियमित निगरानी और संरक्षण नहीं किया गया, जिससे यह स्थिति उत्पन्न हुई हो सकती है।

वैज्ञानिक और भू-वैज्ञानिक कारण क्या हो सकते हैं?

राजगीर के कुंड और झरने केवल धार्मिक मान्यताओं पर आधारित नहीं हैं, बल्कि अपने भू-वैज्ञानिक स्वरूप के कारण भी महत्वपूर्ण हैं। शोध बताते हैं कि राजगीर में गरम पानी के झरने वास्तव में भूगर्भीय रूप से गर्म भू-जल स्रोत (hot springs) हैं, जिनके जल तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इन स्रोतों में थर्मोफिलिक जीवाणु (heat-loving bacteria) पाए जाते हैं, जो वैज्ञानिकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण शोध का विषय हैं।

हाल ही में Vellore Institute of Technology (VIT) के शोधकर्ताओं ने राजगीर के गरमजल कुंड से ऐसे बैक्टीरिया की खोज की है, जो एंटीबायोटिक गुण प्रदर्शित कर सकते हैं। ऐसे जीवाणु चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जिससे राजगीर के गरम जल का वैज्ञानिक महत्व भी बढ़ता है।

लेकिन जल के स्रोतों का अस्तित्व संकट में पड़ना केवल धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह पृथ्वी की सतह के भू-जल और पर्यावरणीय बदलावों से भी जुड़ा है। यदि भू-जल रिचार्ज में गिरावट होती है या स्रोतों के निकट भूमि उपयोग और अतिक्रमण बढ़ता है, तो गर्म जल धाराएँ कम-ज़्यादा होने की संभावना रहती है।

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया और सामाजिक मांग

स्थानीय बुद्धिजीवियों, धर्मप्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने जोर देकर कहा है कि केवल परंपरा के आधार पर 22 और 52 की संख्या को दोहराना अब पर्याप्त नहीं है। वे मांग कर रहे हैं कि ज़िला प्रशासन भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता में एक सत्यापन समिति गठित करे।

इस समिति में पुरातत्व विशेषज्ञ, इतिहासकार, भू-वैज्ञानिक, धार्मिक विद्वान और स्थानीय जानकार शामिल हों। समिति द्वारा वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से गहन भौतिक सत्यापन कराया जाए। सत्यापन के उपरांत आधिकारिक तौर पर सूची सार्वजनिक की जाए ताकि आमजन को वास्तविक स्थिति की जानकारी मिले।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते यह सत्यापन नहीं कराया गया, तो मलमास मेला के दौरान भ्रम और असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे राजगीर की धार्मिक प्रतिष्ठा को भी धक्का लगे।

पर्यटन व्यवस्था पर भी पड़ रहा गहरा प्रभाव

राजगीर का नाम सिर्फ धार्मिक नगरी तक सीमित नहीं है। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक खंडहर, रोप-वे, शांति स्तूप और जंगल सफारी जैसे पर्यटन आकर्षणों के लिए भी प्रसिद्ध है। जैसे कि ब्रह्मकुंड सहित अन्य गरम जल स्रोतों में सर्दियों के मौसम में भी भारी भीड़ उमड़ती है। एक रिपोर्ट में दिसंबर-जनवरी में अकेले गरम जल कुंड में पर्यटकों की भीड़ दर्ज की गयी थी।

लेकिन अगर कुंडों और झरनों का जलस्तर कम होता है तो यह पिकनिक, पर्यटन और स्वास्थ्य-उपचार यात्राओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि गरमजल स्नान को आमतौर पर स्वास्थ्य लाभ (त्वचा रोग, गठिया आदि में राहत) से जोड़ा जाता रहा है।

राजगीर में बढ़ते पर्यटन के साथ ही प्रदूषण और अव्यवस्थित कचरा समस्या भी सामने आई है, जिससे स्थान की स्वच्छता और व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। हाल के प्रदूषण डेटा रिपोर्टों ने बताया कि राजगीर कुछ समय पहले बिहार का तीसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका था, जहाँ पिकनिक और वाहन-भीड़ ने वातावरण को प्रभावित किया।

अहम सवाल कि प्रशासन क्या कर रहा है?

अभी तक ज़िला प्रशासन द्वारा सत्यापन के लिए कोई आधिकारिक समिति की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बोरिंग गतिविधियों पर रोक लगाई गई है, जहाँ से गर्म जल के स्रोत निकले थे। हालांकि यह सब कागजी फाइलों तक ही सीमित हैं। अधिकारियों का कहना है कि वे धाराओं के बंद होने और जलस्तर के घटने के कारणों की जांच जारी रखेंगे और उचित संरक्षित उपाय अपनाए जाएंगे।

वर्तमान में राजगीर में जल संरक्षण विशेषज्ञों और भू-वैज्ञानिकों द्वारा भी अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है, ताकि गर्म जल स्रोतों पर प्रभाव डालने वाले पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक कारणों को समझा और संबोधित किया जा सके।

वैज्ञानिक-आधिकारिक सत्यापन समिति बनाने की मांग

राजगीर में 22 कुंड और 52 झरने की परंपरागत मान्यता ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है, लेकिन वर्तमान समय में कई स्रोतों का जलस्तर घटने या सूखने के कारण यह संख्या अपने वास्तविक स्वरूप में मौजूद नहीं दिखती।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो राजगीर की पहचान और धार्मिक महत्ता में कमी आ सकती है। इसलिए प्रशासन से यह मांग उठ रही है कि एक वैज्ञानिक-आधिकारिक सत्यापन समिति बनाकर वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाये और लोगों को उस पर आधारित जानकारी उपलब्ध करायी जाये।

बहरहाल, मलमास मेला नज़दीक है और इस बीच भौतिक सत्यापन और संरक्षण योजनाओं पर विचार करना न सिर्फ धार्मिक भावनाओं की रक्षा करेगा, बल्कि राजगीर की पर्यावरणीय, भू-वैज्ञानिक और पर्यटन-आर्थिक पहचान को भी सुरक्षित रखेगा।

स्रोतः नालंदा दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय / मीडिया रिपोर्टस्

Nalanda Darpan

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