नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े 52 ऐतिहासिक सरोवरों के पुराने दिन लौटेंगे !
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव सीके अनिल के सख्त निर्देशों के बाद 52 ऐतिहासिक तालाबों की अवैध जमाबंदी रद्द होने के संकेत
राजगीर (नालंदा दर्पण)। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव सीके अनिल के सख्त निर्देशों के बाद प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े 52 ऐतिहासिक तालाबों और सरोवरों पर की गई कथित अवैध जमाबंदी के रद्द होने की उम्मीद एक बार फिर प्रबल हुई है।
यदि विभागीय आदेशों का जमीनी स्तर पर ईमानदारी से अनुपालन किया गया, तो सदियों पुरानी जल संरचनाएं अपने मूल स्वरूप में लौट सकती हैं और नालंदा की जल-संस्कृति को नया जीवन मिल सकता है।
इतिहास गवाह है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय केवल शिक्षा और दर्शन का केंद्र नहीं था, बल्कि वैज्ञानिक जल प्रबंधन का भी उत्कृष्ट उदाहरण था। विश्वविद्यालय और उसके आसपास के क्षेत्र में उस कालखंड में 52 बड़े तालाब, सरोवर और जलाशय मौजूद थे।
इनका उपयोग आचार्य, विद्यार्थी और शोधार्थी स्नान, जल संग्रह, खेती तथा दैनिक आवश्यकताओं के लिए करते थे। ये तालाब वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
आज जब पूरी दुनिया जल संकट से जूझ रही है, तब नालंदा की यह प्राचीन व्यवस्था आधुनिक समय के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।
लेकिन दुर्भाग्यवश समय के साथ इन ऐतिहासिक जल स्रोतों का अस्तित्व संकट में पड़ता चला गया। सूत्रों के अनुसार वर्तमान में आधा दर्जन तालाबों को छोड़कर शेष अधिकांश तालाब या तो पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं या फिर अतिक्रमण और भराव के कारण पहचान खो चुके हैं।
आरोप है कि संबंधित क्षेत्रों के अंचलाधिकारियों द्वारा विभिन्न व्यक्तियों के नाम पर जमाबंदी कायम कर दी गई, जिसके बाद इन तालाबों पर कब्जा होता चला गया। कहीं मिट्टी भरकर मकान खड़े कर दिए गए तो कहीं व्यावसायिक उपयोग में लाकर तालाबों की आत्मा ही खत्म कर दी गई।
इन तालाबों के लुप्त होने का असर सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर तक सीमित नहीं रहा। पारंपरिक जल स्रोतों के नष्ट होने से इलाके में जल संकट गहराता गया। गर्मियों में पेयजल की किल्लत, गिरता भू-जल स्तर और खेती पर पड़ता प्रतिकूल असर अब आम समस्या बन चुकी है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि शायद ही कोई ऐसा गांव बचा हो, जहां बड़े गड्ढे, तालाब, सरोवर, आहार या नदी के हिस्से पर अतिक्रमण या अवैध जमाबंदी न की गई हो।
इसी पृष्ठभूमि में प्रधान सचिव सीके अनिल के निर्देशों को अहम माना जा रहा है। विभागीय स्तर पर संकेत मिले हैं कि सरकारी जमीन और जल संरचनाओं पर की गई अवैध जमाबंदी की समीक्षा की जाएगी और नियमों के खिलाफ पाए जाने पर उन्हें रद्द किया जाएगा।
यह कदम न केवल ऐतिहासिक न्याय की दिशा में होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की पहल भी मानी जा रही है।
हालांकि जमीनी सच्चाई यह भी है कि फिलहाल राजगीर में अवैध जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।
इस संबंध में सहायक समाहर्ता सह अंचलाधिकारी सुश्री कृष्णा जोशी ने बताया कि फार्मर रजिस्ट्रेशन अभियान में राजस्व कर्मचारियों की व्यस्तता के कारण कार्रवाई आरंभ नहीं हो पाई है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अभियान के समाप्त होते ही सरकारी जमीन पर की गई अवैध जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया शीघ्र शुरू की जाएगी।
स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों को उम्मीद है कि यह सिर्फ आश्वासन बनकर न रह जाए। उनका कहना है कि यदि अब भी समय रहते अवैध जमाबंदी रद्द कर इन जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया गया तो एक ओर जहां जल संकट से राहत मिलेगी।
वहीं दूसरी ओर नालंदा की ऐतिहासिक पहचान और गौरव को भी बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई दिशा मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तालाबों के पुनर्जीवन के लिए केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए प्रशासन, स्थानीय समाज और विशेषज्ञों के समन्वय से दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ तालाबों की खुदाई, जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण और नियमित निगरानी आवश्यक होगी।
अब सवाल यह है कि क्या नालंदा की यह अमूल्य जल-धरोहर वास्तव में पुनर्जीवित हो पाएगी या फिर यह पहल भी फाइलों में सिमट कर रह जाएगी। फिलहाल प्रधान सचिव के निर्देशों ने उम्मीद की एक नई किरण जरूर जगाई है।
वेशक यदि यह किरण ठोस कार्रवाई में बदली तो आने वाले वर्षों में नालंदा एक बार फिर अपने जल-वैभव के लिए पहचाना जा सकेगा।





