The shrinking folk tradition of Holi: डीजे के शोर में दब गई ढोलक की थाप, फगुआ की फीकी पड़ती चौपाल
Traditional Holi songs and cultural melodies are fading as modern DJ music takes over rural celebrations

बेन (नालंदा दर्पण)। फागुन की मादक बयार और रंगों की बहार (The shrinking folk tradition of Holi) के बीच गांवों की चौपालें इस बार कुछ खामोश-सी हैं। कभी ढोलक की थाप, मंजीरों की झंकार और पारंपरिक फगुआ गीतों से गूंजने वाले प्रखंड क्षेत्र के गांव अब डीजे की कर्कश धुनों में डूबते जा रहे हैं। बदलते परिवेश और आधुनिकता की चकाचौंध ने सदाबहार होली गीतों को जैसे हाशिये पर धकेल दिया है।
चौपाल से डीजे तक: बदलती होली की धुनः ग्रामीणों का कहना है कि एक समय था जब फागुन लगते ही हर गली-मोहल्ले में फगुआ मंडली सक्रिय हो जाती थी। महिलाएं-पुरुष सामूहिक गायन में जुट जाते थे। ढोलक, झाल और मंजीरे की संगत पर “आज बिरज में होली ये रसिया” और “अवध में होली खेले रघुवीरा” जैसे पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां रात भर गूंजती थीं।
ये गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थे, बल्कि सामाजिक समरसता, आपसी मेल-मिलाप और सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक थे। होली का अर्थ केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों को रंगने का अवसर भी होता था।
अब गिने-चुने लोग ही याद रखते हैं फगुआः गांव के वरिष्ठ नागरिक रमेश सिंह कहते हैं कि पहले रात भर चौपाल में बैठकर पारंपरिक बोलियों के साथ होली गाई जाती थी। अब स्थिति यह है कि गिने-चुने बुजुर्ग ही इन गीतों को याद रखते हैं।
अयोध्या प्रसाद का मानना है कि नई पीढ़ी मोबाइल और आधुनिक संगीत की ओर अधिक आकर्षित है। वे कहते हैं कि फगुआ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, सामाजिक और पारंपरिक मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है। इससे दूरी बढ़ना चिंताजनक है।
लखन प्रसाद याद करते हैं कि जब ‘आज बिरज में होली ये रसिया’ और ‘अवध में होली खेले रघुवीरा’ की गूंज उठती थी तो पैर अपने आप थिरकने लगते थे। अब वह रस और वह अपनापन नहीं रहा।
परंपरा पर बाज़ार और तकनीक का प्रभावः सांस्कृतिक जानकारों के अनुसार गांवों में डीजे संस्कृति का तेजी से प्रसार हुआ है। कम समय में अधिक शोर और ‘मनोरंजन’ उपलब्ध कराने वाली इस व्यवस्था ने पारंपरिक फगुआ मंडलियों को लगभग निष्क्रिय कर दिया है।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण उभरकर सामने आते हैं। स्मार्टफोन और इंटरनेट ने युवाओं की पसंद बदल दी है। डीजे और आधुनिक गानों का प्रचलन ‘ट्रेंड’ के रूप में स्थापित हो गया है। बुजुर्गों से लोकगीतों की परंपरा नई पीढ़ी तक व्यवस्थित रूप से नहीं पहुंच पा रही। सामूहिक अभ्यास और आयोजन की संस्कृति कमजोर पड़ रही है।
प्राकृतिक रंग और पारंपरिक गायन की जरूरतः ग्रामीण हीरालाल कहते हैं कि नई पीढ़ी को रासायनिक रंगों की जगह टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों के उपयोग और डीजे के बजाय पारंपरिक फाग, कबीर और ढोलक गायन के लिए जागरूक करने की आवश्यकता है।
उनके अनुसार, यदि विद्यालयों, पंचायतों और सांस्कृतिक संस्थाओं के स्तर पर फगुआ प्रतियोगिताएं और लोकगीत कार्यशालाएं आयोजित हों, तो परंपरा को नया जीवन मिल सकता है।
संस्कृति के संरक्षण की चुनौतीः फगुआ केवल गीत नहीं, बल्कि गांव की आत्मा का संगीत है। इसमें हास-परिहास है, व्यंग्य है, भक्ति है और सामाजिक संदेश भी। यदि यह परंपरा यूं ही सिमटती रही तो आने वाली पीढ़ियां केवल डिजिटल प्लेलिस्ट में होली खोजेंगी, चौपाल की जीवंत स्मृतियों में नहीं।
दरअसल फागुन की रंगत तभी सार्थक है, जब ढोलक की थाप पर गांव का मन झूमे। सवाल यह है कि क्या हम अपनी लोकधुनों को डीजे के शोर में हमेशा के लिए खो देने को तैयार हैं, या फिर उन्हें सहेजने के लिए सामूहिक पहल करेंगे? स्रोतः रामावतार कुमार/नालंदा दर्पण





