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आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम है राजगीर मलमास मेला

नालंदा दर्पण डेस्क। प्राचीन मगध की राजधानी और विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक नगरी राजगीर इन दिनों फिर एक बार दिव्यता, आस्था और सनातन परंपराओं के विराट उत्सव का साक्षी बनने जा रही है। हर तीन वर्ष पर लगने वाला विश्व विख्यात राजगीर मलमास मेला, जिसे अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास मेला भी कहा जाता है, वह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना, लोकमान्यताओं और प्राचीन संस्कृति का जीवंत महाकुंभ माना जाता है।

मान्यता है कि मलमास की अवधि में पृथ्वी पर समस्त देवी-देवताओं का निवास यदि कहीं होता है तो वह केवल राजगीर की पावन धरती है। यही कारण है कि इस अवधि में लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, सूर्यकुंड और अन्य पवित्र जलधाराओं में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। राजगीर की पहाड़ियों, कुंडों और मंदिरों के बीच गूंजते शंख, घंट और वैदिक मंत्र वातावरण को अलौकिक बना देते हैं।

आखिर क्या है 33 कोटि देवी-देवता’ का वास्तविक अर्थ? लोकमानस में 33 कोटि देवी-देवता” का अर्थ प्रायः 33 करोड़ देवताओं से लगाया जाता है, लेकिन वैदिक और पुराणिक व्याख्याओं में कोटि का अर्थ प्रकार या श्रेणी माना गया है। ऋग्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार सृष्टि संचालन से जुड़ी 33 दिव्य शक्तियों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें चार वर्गों में विभाजित किया गया है- 12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु और 2 अश्विनी कुमार।

धर्माचार्यों के अनुसार राजगीर मलमास मेला इन्हीं 33 दिव्य शक्तियों की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में यहां किए गए स्नान, जप, तप और दान का विशेष महत्व बताया गया है।

राजगीर और देवताओं के आगमन की प्राचीन किंवदंतीः राजगीर से जुड़ी एक अत्यंत प्रचलित किंवदंती के अनुसार जब मलमास को अन्य महीनों की तरह कोई देवता अधिष्ठाता स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उसे पुरुषोत्तम मास का वरदान दिया। इसके बाद समस्त देवी-देवताओं ने इस मास में राजगीर को अपना निवास स्थान बनाया।

स्थानीय पुरोहितों और प्राचीन कथाओं में वर्णित है कि राजगीर की पंचपर्वतीय संरचना वैभवगिरि, विपुलाचल, रत्नागिरि, उदयगिरि और सोनगिरि देवशक्तियों का प्राकृतिक मंडल मानी जाती है। कहा जाता है कि इन पर्वतों के मध्य स्थित ब्रह्मकुंड में स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश की ऊर्जा विद्यमान रहती है।

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल में जरासंध की राजधानी रहे राजगीर में भगवान श्रीकृष्ण भी आए थे। बौद्ध और जैन परंपराओं में भी राजगीर का विशेष स्थान है।

भगवान बुद्ध ने यहां गृद्धकूट पर्वत पर अनेक उपदेश दिए, जबकि भगवान महावीर ने भी इस क्षेत्र में चातुर्मास किया था। यही कारण है कि मलमास मेला केवल सनातन आस्था ही नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक विरासत के बहुधर्मी स्वरूप का भी प्रतीक माना जाता है।

ब्रह्मकुंड में स्नान से मिटते हैं पापः ब्रह्मकुंड को मलमास मेले का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। गर्म जलधारा वाले इस कुंड को लेकर मान्यता है कि यहां स्नान करने से समस्त पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मलमास के दौरान यहां स्नान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। सुबह चार बजे से ही हजारों श्रद्धालु हर-हर महादेव और जय श्रीराम के उद्घोष के साथ कुंडों की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि राजगीर के गर्म जलस्रोतों में प्राकृतिक सल्फर तत्व पाए जाते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है। यही कारण है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां स्वास्थ्य लाभ के लिए भी लोग पहुंचते हैं।

लक्ष्मीनारायण मंदिर और देव उपस्थिति की मान्यताः लक्ष्मीनारायण मंदिर को मलमास मेले के दौरान विशेष रूप से देवताओं का निवास स्थल माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मंदिर परिसर में अदृश्य रूप से देवी-देवताओं की उपस्थिति रहती है। यही वजह है कि यहां अखंड पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला निरंतर चलता रहता है।

रात्रि के समय मंदिर परिसर में दीपों की जगमगाहट और वैदिक मंत्रोच्चार श्रद्धालुओं को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं।

आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक समरसता का भी महापर्वः राजगीर मलमास मेला केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है। यह भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का विराट मंच भी है। देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालु यहां अपनी भाषा, वेशभूषा और परंपराओं के साथ पहुंचते हैं, लेकिन आस्था का सूत्र सभी को एक कर देता है।

संत-महात्माओं के प्रवचन, रामकथा, भागवत कथा, यज्ञ, भंडारे और भजन संध्या पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। यह मेला भारतीय संस्कृति की उस मूल भावना को जीवंत करता है, जिसमें विविधता के बीच एकता का दर्शन निहित है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मिलता है नया जीवनः मलमास मेले का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आगमन से राजगीर और आसपास के क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में भी भारी तेजी आती है।

होटल, धर्मशाला, ई-रिक्शा, टेंपो, भोजनालय, हस्तशिल्प विक्रेता, पूजा सामग्री दुकानदार और स्थानीय छोटे व्यवसायियों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। ग्रामीण महिलाएं भी घरों में बने पारंपरिक खाद्य पदार्थ और हस्तनिर्मित सामग्री बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करती हैं।

पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मेले को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए तो राजगीर विश्वस्तरीय आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में और अधिक विकसित हो सकता है।

प्रशासनिक तैयारियां भी युद्धस्तर परः मलमास मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग व्यापक तैयारियों में जुटा हुआ है। सुरक्षा, ट्रैफिक नियंत्रण, स्वच्छता, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और आपदा प्रबंधन को लेकर विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।

अस्थायी चिकित्सा शिविर, सहायता केंद्र, सूचना काउंटर और पुलिस चौकियां स्थापित की जा रही हैं। साथ ही सीसीटीवी निगरानी और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती भी सुनिश्चित की जा रही है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

आस्था, इतिहास और अध्यात्म का जीवंत संगमः राजगीर का मलमास मेला भारतीय सभ्यता की उस विराट परंपरा का प्रतीक है, जहां प्रकृति, अध्यात्म और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े दिखाई देते हैं। 33 कोटि देवी-देवता की अवधारणा यह बताती है कि भारतीय दर्शन में सृष्टि की प्रत्येक शक्ति को देवत्व के रूप में सम्मान दिया गया है।

यही कारण है कि हर तीन वर्ष पर राजगीर केवल एक शहर नहीं रह जाता, बल्कि वह आस्था का ऐसा दिव्य लोक बन जाता है, जहां श्रद्धालु यह विश्वास लेकर पहुंचते हैं कि देवताओं की इस नगरी में की गई पूजा-अर्चना उनके जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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