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खेत में उग रही है सेहत की नई फसल, चना छोड़ चिया की ओर बढ़े किसान!

इस्लामपुर में औषधीय पौधों पर चल रहा परीक्षण; पोषक तत्वों से भरपूर चिया सीड की बढ़ती मांग के बीच खेती और बाजार पर किसानों की नजर

इस्लामपुर स्थित अनुसंधान केंद्र में औषधीय एवं उपयोगी पौधों पर हो रहे अध्ययन के बीच चिया सीड की खेती पर बढ़ती चर्चा यह संकेत देती है कि आने वाले समय में पोषण आधारित फसलों के लिए किसानों और बाजार के बीच नए अवसर विकसित हो सकते हैं…

इस्लामपुर (नालंदा दर्पण)। बदलते मौसम, बढ़ती खेती लागत और कई पारंपरिक फसलों से अपेक्षित आमदनी नहीं होने के बीच चिया सीड की खेती किसानों के लिए एक वैकल्पिक फसल के रूप में उभर रही है। इस्लामपुर स्थित मगही पान अनुसंधान केंद्र के मेडिसिन प्लांट में चिया समेत औषधीय पौधों पर परीक्षण किया जा रहा है। केंद्र से जुड़े वैज्ञानिक शिवनाथ दास ने बताया कि चिया सीड में मौजूद पोषक तत्वों और इसकी खेती की संभावनाओं को लेकर परीक्षण एवं अध्ययन जारी है।

चिया सीड को आमतौर पर पोषण से भरपूर बीज माना जाता है। इसमें फाइबर, प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इसके कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच इसकी मांग बढ़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर चिया सीड पाचन स्वास्थ्य, तृप्ति की भावना और समग्र पोषण में योगदान कर सकता है। हालांकि, इसे किसी बीमारी का इलाज या अकेले वजन घटाने की गारंटी देने वाला खाद्य पदार्थ नहीं माना जाना चाहिए।

20 से 30 डिग्री तापमान में बेहतर खेती

चिया की खेती के लिए गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम तथा अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेती के दौरान करीब 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है। उपलब्ध कृषि जानकारी के अनुसार बिहार जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए अक्टूबर-नवंबर का समय उपयोगी हो सकता है।

बीज की बुवाई लगभग 1.5 सेंटीमीटर गहराई पर की जा सकती है। पौधों के बीच करीब 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी रखने की सलाह दी जाती है। सामान्य परिस्थितियों में फसल लगभग 100 से 130 दिनों में तैयार हो सकती है। जब पौधे सूखने लगें और बीज कठोर हो जाएं, तब कटाई की जाती है।

प्रति हेक्टेयर 400 से 600 किलो तक उपज का दावा

चिया की औसत उपज करीब 400 से 600 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई जाती है। हालांकि वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, बीज की गुणवत्ता, सिंचाई, कृषि प्रबंधन और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

चिया को अपेक्षाकृत कम पानी में उगाई जाने वाली फसल के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि सीमित जल संसाधन वाले इलाकों में किसान इसे अन्य फसलों के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। बिहार के जमुई सहित कुछ जिलों में किसानों द्वारा चिया सीड की खेती में रुचि लेने की बात सामने आ रही है।

बाजार में कीमत और ब्रांडिंग पर जोर

चिया सीड की बिक्री के लिए केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता, साफ-सफाई, पैकेजिंग और बाजार से जुड़ाव भी महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए आकर्षक पैकेजिंग, ऑनलाइन बिक्री, स्थानीय बाजार और सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने से किसानों अथवा उत्पादकों को बेहतर बाजार मिल सकता है।

स्थानीय बाजार में चिया सीड की कीमत 15,000 से 19,000 रुपये प्रति क्विंटल तक मिलने का दावा किया जा रहा है। हालांकि वास्तविक कीमत गुणवत्ता, मांग, मौसम, स्थान, खरीदार और बाजार की स्थिति के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसानों को फसल लगाने से पहले स्थानीय मंडी और संभावित खरीदारों से वर्तमान भाव की जानकारी लेना जरूरी होगा।

हेल्थ फूड के रूप में बढ़ी पहचान

चिया सीड का इस्तेमाल आजकल कई लोग दलिया, स्मूदी, दही और अन्य खाद्य पदार्थों में करते हैं। पानी में भिगोने पर इसके बीज जेल जैसी परत बना लेते हैं, जिससे यह लंबे समय तक तृप्ति की भावना देने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल किया जाता है।

वजन प्रबंधन के संदर्भ में भी चिया सीड की चर्चा होती है, क्योंकि इसमें फाइबर की मात्रा अच्छी होती है। लेकिन केवल चिया सीड खाने से वजन कम होना सुनिश्चित नहीं होता। संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ इसे आहार का हिस्सा बनाना अधिक उचित माना जाता है।

किसानों के लिए क्या है खास?

चिया सीड की खेती में अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत, पोषण बाजार में बढ़ती रुचि और संभावित बाजार मूल्य जैसे पहलू किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। खासकर ऐसे क्षेत्रों में, जहां पानी सीमित है या पारंपरिक फसलों से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहां किसान इसे वैकल्पिक फसल के रूप में आजमा सकते हैं।

हालांकि, बड़े पैमाने पर खेती शुरू करने से पहले मिट्टी की जांच, स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह, प्रमाणित बीज की उपलब्धता, संभावित उपज और स्थानीय बाजार भाव की जानकारी लेना जरूरी है। इससे खेती में जोखिम कम करने और बाजार के अनुसार उत्पादन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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