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राजगीर के पौराणिक गर्मजल कुंडों पर गहराता संकट, जनवरी में ही सूखे कई कुंड

राजगीर (नालंदा दर्पण)। पर्यटन, अध्यात्म और ऐतिहासिक विरासत के लिए विश्वविख्यात राजगीर के गर्मजल कुंडों का अस्तित्व एक बार फिर गंभीर संकट में पड़ता नजर आ रहा है। जहां सूर्यकुंड क्षेत्र के सभी कुंडों की जलधाराएं अब भी यथावत प्रवाहित हो रही हैं, वहीं ब्रह्मकुंड क्षेत्र के कई प्रसिद्ध कुंड दशकों से बार-बार सूखने की समस्या से जूझ रहे हैं।

इस वर्ष हालात और भी चिंताजनक हो गए हैं, क्योंकि जनवरी महीने में ही ब्रह्मकुंड क्षेत्र के कई गर्मजल कुंडों की जलधाराएं पूरी तरह सूख चुकी हैं। यह पहली बार है जब वर्ष के शुरुआती महीने में ही इस तरह की स्थिति सामने आई है।

कुंडों के सूखने के कारणों को लेकर अब तक न तो शासन-प्रशासन और न ही भूगर्भीय जल वैज्ञानिक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंच सके हैं। न ही इस दिशा में कोई प्रभावी और दीर्घकालिक पहल होती दिख रही है।

सूर्यकुंड और ब्रह्मकुंड क्षेत्र के सभी कुंडों का मूल जलस्रोत आसपास की पहाड़ियां मानी जाती हैं। ऐसे में इन पहाड़ियों से निकलने वाली प्राकृतिक जलधाराओं का इस तरह कमजोर पड़ जाना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि कुंड क्षेत्रों के आसपास बड़े पैमाने पर हो रही बोरिंग इसका प्रमुख कारण हो सकती है। राजगीर में दर्जनों स्थानों पर बोरिंग से गर्मजल निकलने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है।

आशंका जताई जा रही है कि इसी अनियंत्रित भूगर्भीय जल दोहन के कारण कुंडों की प्राकृतिक जलधाराएं कमजोर हो रही हैं। इसे रोकने के लिए अब बोरिंग पर सख्त प्रतिबंध लगाने की मांग तेज हो गई है।

गंगा-यमुना कुंड, अनंत ऋषि कुंड, मारकंडे कुंड, व्यास कुंड, सरस्वती कुंड, सीता कुंड, गोदावरी कुंड, दुखहरनी कुंड सहित ब्रह्मकुंड क्षेत्र के कई प्रसिद्ध कुंडों की जलधाराएं पूरी तरह सूख चुकी हैं। इस स्थिति ने धार्मिक संगठनों, पुरोहितों और स्थानीय बुद्धिजीवियों की चिंता बढ़ा दी है।

उनका कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले मलमास मेला के दौरान स्थिति और भयावह हो सकती है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव ऐतिहासिक और पौराणिक मलमास मेला पर भी पड़ेगा।

अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. धीरेंद्र उपाध्याय ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजगीर के कुंडों के सूखने का मुख्य कारण कुंड क्षेत्रों के आसपास बड़े पैमाने पर की गई बोरिंग है।

उन्होंने बताया कि गंगाजल की पर्याप्त आपूर्ति होने के बावजूद धार्मिक प्रतिष्ठानों, उद्यानों, होटलों और अन्य संस्थानों द्वारा भूगर्भीय जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने वर्षों से सूखे पड़े भेलवाडोभ जलाशय पर भी चिंता जताई और कहा कि इस जलाशय का संबंध कुंडों से बताया जाता है।

डॉ. उपाध्याय के अनुसार भेलवाडोभ जलाशय में गाद भर जाने के कारण वह उथला हो गया है, जिससे उसमें वर्षा जल का समुचित संग्रह नहीं हो पाता।

अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्ट्रीय प्रचार मंत्री एवं राजगीर तपोवन तीर्थ रक्षार्थ पंडा कमेटी के प्रवक्ता सुधीर कुमार उपाध्याय ने कहा कि राजगीर सदियों से 22 कुंडों और 52 जलधाराओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर भी है। कुंडों और झरनों का सूखना किसी भी दृष्टि से शुभ संकेत नहीं है।

उन्होंने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लेने की अपील की।

बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर वर्ष 2010-11 में भी कुंडों के सूखने की समस्या को लेकर गहन शोध कराया गया था। उस समय तत्कालीन मुख्य सचिव, जल संसाधन विभाग एवं लघु जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव, पटना प्रमंडलीय आयुक्त और जिला पदाधिकारी सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक राजगीर में हुई थी। कोलकाता से विशेषज्ञों को बुलाकर गंभीर चिंतन-मंथन भी किया गया था।

बावजूद इसके आज एक बार फिर वही संकट सामने आ खड़ा हुआ है, जो यह संकेत देता है कि अब आधे-अधूरे प्रयासों से काम नहीं चलेगा। राजगीर के पवित्र गर्मजल कुंडों को बचाने के लिए ठोस नीति, सख्त नियम और दीर्घकालिक समाधान की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनमोल धरोहर का साक्षात अनुभव कर सकें।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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