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बेंच-डेस्क घोटाला: नालंदा DM ने खोली पुरानी फाइल, DEO से जवाब तलब

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण) नालंदा जिले में बेंच-डेस्क घोटाला की पुरानी फाइल एक बार फिर चर्चा में है। जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच को फिर से शुरू करने का आदेश दिया है। इस घोटाले में एक दोषी के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने और दूसरे के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। डीएम ने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) से जवाब मांगा है कि सभी दोषियों पर एक समान कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

जिला निगरानी समिति धावा दल की जांच रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने गोपनीय शाखा के माध्यम से डीईओ को पत्र भेजा है। इस पत्र में कहा गया है कि उत्क्रमित मध्य विद्यालय देकपुरा (रहुई) में बेंच-डेस्क की आपूर्ति किए बिना ही लता इंटरप्राइजेज को फर्जी बिल के आधार पर भुगतान कर दिया गया।

इस मामले में तत्कालीन लिपिक अजय कुमार और तत्कालीन स्थापना डीपीओ सुजीत कुमार राउत के खिलाफ बिहार वित्त नियमावली के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। साथ ही लता इंटरप्राइजेज के खिलाफ फर्जी बिल प्रस्तुत करने के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।

डीईओ को भेजे गए शोकॉज में स्पष्ट किया गया है कि जिला निगरानी समिति की जांच रिपोर्ट के आधार पर लता इंटरप्राइजेज को बिना आपूर्ति के भुगतान की गई राशि की वसूली, प्राथमिकी दर्ज करने और उत्क्रमित मध्य विद्यालय देकपुरा के प्रधानाध्यापक व कार्यालय लिपिक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का निर्देश दिया गया था।

हालांकि तत्कालीन डीडीओ सह डीपीओ स्थापना सुजीत कुमार राउत के खिलाफ किसी कार्रवाई का उल्लेख नहीं किया गया। इस भेदभाव पर सवाल उठाते हुए डीएम ने डीईओ से जवाब मांगा है कि सभी दोषियों के खिलाफ समान कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

जिला निगरानी समिति धावा दल की जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के आधार पर डीएम ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने निर्देश दिया है कि सुजीत कुमार राउत और अन्य चिन्हित दोषी कर्मियों व पदाधिकारियों के खिलाफ बिहार वित्त नियमावली के तहत कार्रवाई की जाए। साथ ही इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए विस्तृत प्रतिवेदन डीएम को उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है।

बता दें कि यह घोटाला नालंदा जिले के शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। बेंच-डेस्क जैसे आवश्यक संसाधनों की आपूर्ति के बिना ही भुगतान कर देने से न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ, बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के हितों को भी ठेस पहुंची।

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