राजगीर किला मैदान की खुदाई से मौर्यकालीन इतिहास में जुड़ेगा नया अध्याय

नालंदा दर्पण डेस्क। राजगीर किला मैदान की खुदाई में मिल रहे अवशेष न सिर्फ नालंदा और बिहार, बल्कि भारत के इतिहास में नया अध्याय जोड़ेंगे। यहां रिंग वेल के अवेशष के साथ ही मौर्यकालीन मुहर व अन्य साक्ष्य मिले हैं।

यही कारण है कि कई राज्यों के शिक्षाविद व पुरातत्विद इसके अवलोकन के लिए किला मैदान पहुंचे तो उन लोगों ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह खुदाई निश्चित रूप से इतिहास को नया आयाम देने में सक्षम होगी। किला मैदान की अभी कुछ फीट ही खुदाई की गयी है। और नीचे जाने पर कई सभ्यताओं के अवेशष मिलने की प्रबल संभावना जतायी जा रही है।

बिहार पुरातत्व विभाग से सेवानिवृत्त निदेशक अतुल कुमार वर्मा के नेतृत्व में आये शिक्षाविदों ने खुदाई का घंटों अवलोकन किया। हर अवशेष का बारीकी अध्ययन के बाद उनकी ऐतिहासिकता पर गहन मंथन किया।

उनकी टीम में जेएयूए नई दिल्ली के कार्यपालक सचिव डॉ. दिनेश कुमार, गुजरात के एजी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. केबी कटारिया, बिहार एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी पटना के रजिस्ट्रार डॉ. संजीव कुमार व अन्य शामिल थे।

टीम के सदस्यों ने बताया कि मौर्य काल की मुहर मिलने का मतलब साफ है कि किला मैदान की सतह के नीचे कई संस्कृतियों के अवेशष दबे पड़े हैं। खुदाई से नया व पुराना राजगृह के क्षेत्रों को चिह्नित करने में मदद मिलेगी।

यह भी बताया कि किला मैदान के चारों ओर बनी सुरक्षा दीवार की ऊपरी सतह पत्थर से बने हैं। लेकिन, इसके नीचे ईंटें हैं। यह दीवार ईंट, पत्थर व मिट्टी से बनी है। इसके अध्ययन से राजगीर की अति प्राचीन साइक्लोपियन वॉल की संरचना समझने में आसान होगी। साथ ही, उसके काल निर्धारण में मदद मिलेगी। अगर इस कार्य में पुरातत्वविदों को सफलता मिलती है, तो विश्व इतिहास में में नया अध्याय जुड़ सकेगा।

खुदाई के संबंध में पुरातत्वविद अतुल कुमार वर्मा ने एएसआई के अधीक्षक पुरातत्वविद सुजीत नयन को कई सलाह भी दी है। उन्होंने नालंदा के तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय की खुदाई में अहम भूमिका निभायी थी।

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