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बेंच-डेस्क खरीद घोटाला: नालंदा DEO पर लगे गंभीर आरोपों की उच्चस्तरीय जांच शुरू

इस बेंच-डेस्क खरीद घोटाला प्रकरण ने सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे जहां एक ओर शिक्षा विभाग की साख पर असर पड़ा है, वहीं दूसरी ओर वेंडर्स में प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति अविश्वास की भावना बढ़ी है

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले में बेंच-डेस्क खरीद घोटाला का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) राज कुमार के खिलाफ कमीशन मांगने के गंभीर आरोपों की जांच जिला प्रशासन ने शुरू कर दी है। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने इस मामले को प्राथमिकता देते हुए उपविकास आयुक्त श्रीकांत कुंडलीक खांडेकर को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है।

दरअसल वर्ष 2024 में नालंदा जिले के सरकारी विद्यालयों में बेंच-डेस्क की बड़ी मात्रा में खरीद की गई थी। इनका वितरण प्रताप इंडस्ट्रीज एंड प्रताप मेटल्स द्वारा किया गया। आरोप है कि जिला शिक्षा पदाधिकारी ने इन बेंच-डेस्क की आपूर्ति के लिए 10 प्रतिशत कमीशन लेकर आंशिक भुगतान किया और शेष राशि के भुगतान के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त कमीशन की मांग की।

वेंडर प्रशांत कुमार ने डीईओ पर गंभीर आरोप लगाते हुए जिलाधिकारी को शिकायत दी। प्रशांत ने कहा कि वे कमीशन का भुगतान करने में असमर्थ हैं। डीईओ के द्वारा अनुचित तरीके से उनकी कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उपविकास आयुक्त ने एक पांच-सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है। समिति में भूमि सुधार उपसमाहर्ता, साइबर सेल के पुलिस उपाधीक्षक, अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी, सामाजिक सुरक्षा कोषांग के सहायक निदेशक और भवन प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता शामिल हैं।

वहीं 27 दिसंबर, 2024 को जिला निगरानी समिति की बैठक में भी इस मामले पर चर्चा की गई और जांच के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटाए गए। फिलहाल जांच समिति इस पूरे मामले की गहराई से छानबीन कर रही है।

अब प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि मामले की निष्पक्ष जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यदि डीईओ पर लगे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह जिला प्रशासन के लिए एक बड़ी सफलता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम होगा।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह के मामलों को समय पर नहीं रोका गया तो शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सरकारी धन का दुरुपयोग रोकने के लिए पारदर्शी प्रक्रियाओं और कड़ी निगरानी की आवश्यकता है।

फिलहाल जांच समिति के निष्कर्ष और प्रशासन की कार्रवाई पर पूरे जिले की नजरें टिकी हैं। अगर दोष सिद्ध होता है, तो यह मामला न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक उदाहरण बनेगा, बल्कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता के लिए नई मिसाल भी स्थापित करेगा।

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