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नव नालंदा महाविहार: पाली और बौद्ध अध्ययन का एक चमकता सितारा

नालंदा दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय। क्या आपने कभी उस स्थान की कल्पना की है, जहाँ प्राचीन काल में विश्व भर के विद्वान ज्ञान की खोज में एकत्रित होते थे? जी हाँ, नव नालंदा महाविहार कभी विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। जोकि ऐसी ही एक पवित्र भूमि थी।

पाँचवीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त द्वारा स्थापित यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक ज्ञान का केंद्र रहा है। यहाँ 10000 छात्र और 2000 शिक्षक बौद्ध धर्म, दर्शन, चिकित्सा, गणित और खगोलशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन करते थे।

चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों ने इसकी भव्यता को अमर कर दिया, जिसमें उन्होंने नालंदा के विशाल पुस्तकालय और विद्वानों की विद्या की प्रशंसा की। लेकिन 13वीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा इसे नष्ट कर दिया गया, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध शिक्षा को गहरा आघात पहुँचाया।

इस गौरवशाली इतिहास की छाया में, स्वतंत्र भारत ने प्राचीन नालंदा की विरासत को पुनर्जनन करने का संकल्प लिया। 1951 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बौद्ध भिक्षु जगदीश कश्यप की प्रेरणा से नव नालंदा महाविहार की स्थापना की गई।

इसका उद्देश्य था प्राचीन नालंदा के ज्ञान-केंद्र को पुनर्जनन करना, विशेष रूप से पाली साहित्य और बौद्ध धर्म के अध्ययन को बढ़ावा देना। यह संस्थान ऐतिहासिक इंद्रपुष्कर्णी झील के दक्षिणी तट पर स्थापित किया गया, जो प्राचीन नालंदा के भग्नावशेषों के निकट है। ताकि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहे।

आज नव नालंदा महाविहार केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवंत शैक्षिक संस्थान है, जो पाली और बौद्ध अध्ययन का विश्व-स्तरीय केंद्र बन चुका है। 2006 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जिसने इसकी शैक्षिक प्रतिष्ठा को और सुदृढ़ किया।

यह संस्थान न केवल पाली और बौद्ध धर्म की गहन पढ़ाई प्रदान करता है, बल्कि अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, विदेशी भाषाएँ, इतिहास, दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र जैसे विषयों में भी उच्च शिक्षा उपलब्ध कराता है।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक संस्थान जो प्राचीन परंपराओं को संजोए हुए है, आधुनिक युग में भी प्रासंगिक बना हुआ है। नव नालंदा महाविहार ने नए विषयों जैसे जापानी विद्या, बौद्ध पर्यटन, योग और विपश्यना को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है, जो इसे वैश्विक स्तर पर और आकर्षक बनाते हैं।

म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने त्रिपिटक और बौद्ध ग्रंथों के सेट इस संस्थान को दान किए हैं, जिससे इसका पुस्तकालय विश्व की अमूल्य निधियों में से एक बन गया है। परम पावन दलाई लामा द्वारा दान किए गए तिब्बती त्रिपिटक के सेट इसकी शोभा बढ़ाते हैं।

नव नालंदा महाविहार की एक विशेषता यह है कि यह शुरू से ही एक आवासीय संस्थान रहा है, जो भारतीय और विदेशी छात्रों को एक साथ शिक्षा प्रदान करता है। यहाँ सीमित संख्या में प्रवेश सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक छात्र को व्यक्तिगत ध्यान मिले, जैसा कि प्राचीन नालंदा में होता था।

हाल के वर्षों में, संस्थान ने अपने परिसर का विस्तार किया है। 2021 में इसके 71वें स्थापना समारोह में, भगवान बुद्ध की आठ फीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण और नए सूचना, प्रकाशन और अतिथि गृह का लोकार्पण किया गया।

इसके अलावा दस एकड़ भूमि पर एक बड़ा ऑडिटोरियम और 100 बेड का महिला छात्रावास बनाने की योजना है, जो विशेष रूप से विदेशी और महिला छात्रों के लिए शिक्षा को और सुलभ बनाएगा।

हालाँकि नव नालंदा महाविहार ने अपनी स्थापना के बाद से उल्लेखनीय प्रगति की है, इसे अभी भी कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। प्राचीन नालंदा की तरह अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त करना अभी भी एक लक्ष्य है। फिर भी बौद्ध धर्म की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता और भारत की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में भारतीय ज्ञान परंपराओं को दिए गए स्थान ने इसे नई ऊर्जा दी है।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह संस्थान एक दिन विश्व के सभी विश्वविद्यालयों के लिए प्रेरणा बन सकता है? जैसा कि विद्वान अभय के. ने अपनी पुस्तक Nalanda: How it Changed the World में कहा है कि नालंदा की वास्तुकला और ज्ञान परंपरा आज भी विश्वविद्यालयों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करती है। नव नालंदा महाविहार इस विरासत को न केवल संरक्षित कर रहा है, बल्कि इसे आधुनिक संदर्भ में ढालकर विश्व भर के विद्वानों और छात्रों को आकर्षित कर रहा है।

नव नालंदा महाविहार प्राचीन नालंदा की आत्मा को जीवित रखते हुए आधुनिक युग में बौद्ध अध्ययन और पाली साहित्य का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह न केवल एक शैक्षिक संस्थान है, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सेतु भी है, जो भारत और विश्व को जोड़ता है। इसके नए पाठ्यक्रम बुनियादी ढांचे का विस्तार और वैश्विक सहयोग इसे भविष्य के लिए और सशक्त बनाते हैं।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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