नालंदाबिग ब्रेकिंगबिहार शरीफ

थानेदारों की लापरवाहीः मौज कर रहे अपराधी, भुगत रहे निर्दोष, कोर्ट ने लिया कड़ा संज्ञान

सभी थानों में वैसे अपराध जिसमें मामूली सजा या जुर्माने का प्रावधान है का अनुसंधान भी वर्षों से लंबित रखा गया है। अनुसंधान लंबित रहने के कारण न सिर्फ इसका फायदा अपराधियों को मिलती है, बल्कि निर्दोष को बेवजह कोर्ट का चक्कर लगाने पड़ते हैं। हालांकि कोर्ट द्वारा कई बार पुलिस पदाधिकारियों से जवाब-तलब किया गया है फिर भी अनुसंधान लंबित ही है….

नालंदा दर्पण डेस्क।  अपर जिला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी सह डीएलएमसी के प्रभारी सचिव मानवेन्द्र मिश्र ने वर्षों से ऐसे ही लंबित मामलों को लेकिन सोहसराय थानाध्यक्ष से कोर्ट में सदेह हाजिर होकर लंबित रहने का कारण सहित सूची मांगी है।

एक सप्ताह के अंदर पांच साल से ऊपर के लंबित पुराने मामलों की प्रगति रिपोर्ट समुचित कारण के साथ सदेह हाजिर होकर उपस्थित नहीं कराने पर विभागीय कार्रवाई के लिए वरीय पदाधिकारी को लिखा जायेगा।

यदि निर्धारित अवधि में जवाब दाखिल नहीं किया गया तो न्यायालय यह मानकर एकपक्षीय कार्रवाई करेगी कि बचाव में कुछ नहीं कहना है। साथ ही इस आदेश की कॉपी एसपी को भी भेजी गयी है।

अनुसंधान समीक्षा कर निर्देश दें एसपीः न्यायालय द्वारा यह भी निर्देश दिया गया है कि एसपी अपने स्तर से अन्य थानों में अनुसंधान के लिए पांच साल से ऊपर के मामलों की समीक्षा कर थाना प्रभारी को आवश्यक निर्देश दें।

बता दें कि इस संबंध में डिस्ट्रीक लीगल मॉनिटरिंग कमिटी की बैठक में भी जिला जज डा. रमेश चंद द्विवेदी द्वारा पूर्व में ही निर्देश दिया जा चुका है।

निर्देश दिया गया है कि एसपी अनुसंधान के लिए पांच साल से ऊपर के मामलों थाना प्रभारी को जरूरी निर्देश दें

अनुसंधान लंबित रहने से अपराधियों को मिलता है फायदाः अनुसंधान लंबित रहने का फायदा अपराधियों को मिलता है। समन के मामले जिसमें अधिकतम सजा दो वर्ष या जुर्माना है अथवा वैसे अपराध जिसमें अधिकतम सजा तीन वर्ष अथवा जुर्माना है और सुलहनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं, जैसे मामले भी पुलिस अनुसंधान के नाम पर लंबित रखती है।

जबकि ऐसे मामलों में समय सीमा के अंदर चार्जशीट नहीं देने पर जज आगे अनुसंधान रोकने के लिए आदेश दे सकते हैं। समय पर चार्जशीट नहीं होने पर कई बार अभियुक्त अपनी जमानत भी करा लेते हैं।

क्या है कानून आईपीसी की धारा-468 : किसी अपराध का संज्ञान परिसीमा काल की समाप्ति के बाद करने से रोक लगाती है। समय के अंदर चार्जशीट नहीं दिये जाने के कारण कई मामले परिसीमा काल से बाधित हो चुके हैं।

जबकि उच्च न्यायालय का आदेश है कि शीघ्र विचारण अभियुक्त का मौलिक अधिकार है। वहीं धारा 309 न्यायालय पर मामले की शीघ्र जांच एवं विचारण का दायित्व देता है।

8 साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं मामले: सोहसराय थाना में कुछ मामले 8 साल से भी ज्यादा समय से लंबित है। इनमें वैसे मामले भी हैं जो परिसीमा काल से बाधित हो गया है। यानी पुलिस अब चार्जशीट देती भी है तो जज आगे अनुसंधान पर रोकने के लिए आदेश दे सकते हैं।

ऐसा ही एक मामला एफआईआर संख्या- 128/13 है। जो आईपीसी 468 के कारण परिसीमा काल से बाधित है लेकिन पुलिस ने चार्जशीट नहीं दिया है। दूसरा मामला 36/2015 है। यह भी परिसीमा काल से बाधित है।

इसी प्रकार एफआईआर संख्या 78/2015 भी समन मामला है। एफआईआर संख्या 90/2013, 191/2017, 137/15, 126/2015, 13/2014 का अनुसंधान भी पुलिस ने वर्षों से लटकाये रखा है।

मुकेश भारतीय

मुकेश भारतीय वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, प्रशासन और स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर लेखन-संपादन करते हैं। More »
The unsolved mysteries of the ancient Nalanda University राजगीर पांडु पोखर एक ऐतिहासिक पर्यटन धरोहर Rajgir Sone Bhandar is the world’s biggest treasure Artificial Intelligence is the changing face of the future