अब 5वीं और 8वीं में फेल होने पर उसी कक्षा में लटके रहेंगे छात्र-छात्राएं

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के इस ताजा फैसले को लेकर माता-पिता, छात्रों और शिक्षकों के बीच मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा, जबकि कुछ इसे बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालने वाला कदम मान रहे हैं

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। शिक्षा व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। ‘अनुत्तीर्ण न करने की नीति’ (नो डिटेंशन पॉलिसी) को खत्म करते हुए यह घोषणा की गई है। अब 5वीं और 8वीं कक्षा के छात्र-छात्राओं को हर हाल में पास नहीं किया जाएगा। इसके बजाय उन्हें अगली कक्षा में तभी भेजा जाएगा, जब वे सभी विषयों में न्यूनतम आवश्यक अंक प्राप्त करेंगे।

केंद्रीय शिक्षा सचिव ने जानकारी दी कि नये ‘निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार संशोधन नियम 2024’ के तहत यदि कोई छात्र फेल होता है तो उसे दो महीने के भीतर फिर से परीक्षा देने का अवसर दिया जाएगा। यदि छात्र दूसरी परीक्षा में पास हो जाता है, तो उसे अगली कक्षा में प्रमोट किया जाएगा। लेकिन यदि वह इसमें भी असफल रहता है, तो उसे उसी कक्षा में एक और वर्ष तक पढ़ाई करनी होगी।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रारंभिक शिक्षा के दौरान किसी भी छात्र को स्कूल से निष्कासित नहीं किया जाएगा। इसका उद्देश्य बच्चों को पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित करना है और उनके शैक्षणिक प्रदर्शन को सुधारना है।

‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ क्यों की गई खत्म? पहले लागू ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ का उद्देश्य था कि बच्चों को शैक्षणिक असफलता के कारण होने वाले मनोवैज्ञानिक दबाव से बचाया जाए। हालांकि विशेषज्ञों का मानना था कि इस नीति के चलते बच्चों में पढ़ाई के प्रति गंभीरता की कमी हो रही थी और शैक्षणिक मानकों में गिरावट आ रही थी।

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार इस फैसले का मकसद छात्रों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना और उन्हें मजबूत शैक्षणिक नींव प्रदान करना है। अब छात्रों को हर विषय में पास होना अनिवार्य होगा। जिससे उनकी पढ़ाई में रुचि और गंभीरता बढ़ेगी।

इस बदलाव से छात्रों और शिक्षकों, दोनों पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। छात्रों को अब पढ़ाई में अधिक ध्यान देना होगा क्योंकि फेल होने पर दोबारा उसी कक्षा में रहना पड़ सकता है। हालांकि अतिरिक्त परीक्षा का अवसर यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी छात्र अपनी एक असफलता के कारण पिछड़ न जाए। शिक्षकों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे छात्रों को अच्छे से समझाएं और उनकी कमजोरियों को दूर करें ताकि वे शैक्षणिक मानकों को पूरा कर सकें।

इस फैसले को लेकर माता-पिता, छात्रों और शिक्षकों के बीच मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। जबकि कुछ इसे बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालने वाला कदम मान रहे हैं।

वहीं शिक्षा विभाग का कहना है कि इस कदम से बच्चों की पढ़ाई में अनुशासन और गंभीरता आएगी। साथ ही शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा और बच्चों का शैक्षणिक स्तर बेहतर होगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह नया नियम किस हद तक छात्रों और शिक्षा प्रणाली पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

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