प्रशासनिक संलिप्ता से राजगीर में सरकारी जमीन पर बढ़ता अतिक्रमण

राजगीर (नालंदा दर्पण)। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसके प्रति प्रशासन की उदासीनता चिंता का विषय है। एक ओर जहां सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए जमीन की कमी आड़े आ रही है। वहीं दूसरी ओर राजगीर नगर परिषद क्षेत्र में सरकारी जमीन की खुलेआम लूट मची हुई है। जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के चलते अतिक्रमणकारियों ने शहर में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नगर परिषद ने अतिक्रमण की गई जमीन की जांच-पड़ताल शुरू नहीं की है।

नगर परिषद क्षेत्र में करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। यह जमीन सार्वजनिक हित और विकास कार्यों के लिए सुरक्षित होती है। लेकिन स्वार्थ और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह अतिक्रमण की भेंट चढ़ रही है। पंडितपुर का गंगासागर तालाब, लेलिन नगर और ठाकुरथान का तालाब जैसे जलस्रोत पूरी तरह अतिक्रमण की चपेट में हैं। इसी तरह पारंपरिक जलस्रोत जैसे पड़ने और सतलठबा कुआं सहित कई अन्य कुओं और सरकारी जमीनों पर भी अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। इन जमीनों पर अवैध निर्माण, दुकानें, मकान और व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। शहर के सरकारी जमीन और जलस्रोत अब केवल नक्शों तक सीमित रह गए हैं।

लेदुआ पुल से रेलवे स्टेशन, पंचवटी नगर, अम्बेडकर नगर और पंडितपुर से दरियापुर तक जाने वाली पइन भी अतिक्रमण का शिकार हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर मुद्दे पर नगर परिषद ने अब तक कोई विधिसम्मत कार्रवाई नहीं की है। राजगीर एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल होने के नाते यहां जमीन की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका फायदा उठाकर कुछ प्रभावशाली लोग और भूमाफिया सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए हुए हैं।

प्रशासन की उदासीनता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब तक न तो अतिक्रमण की गई जमीन का सही आकलन किया गया है और न ही अतिक्रमणकारियों को हटाने की कोई कार्रवाई शुरू की गई है। सरकारी रिकॉर्ड और जमीन का डिजिटल सर्वेक्षण अत्यंत आवश्यक है। ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितनी जमीन पर अतिक्रमण है और कितनी जमीन नगर परिषद के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो चुकी है। कुछ मामलों में अंचल कार्यालय की मिलीभगत से जमाबंदी कायम की गई थी। जिसे रद्द करने और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज करने के वर्षों बाद भी सरकारी जमीन को अतिक्रमणमुक्त नहीं कराया गया है।

स्थानीय नागरिक, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि समय-समय पर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यदि अतिक्रमण के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले समय में यह समस्या और जटिल हो सकती है। इससे न केवल नगर विकास की योजनाएं बाधित होंगी, बल्कि नगर परिषद के वार्डों में पार्क और अन्य सुविधाओं के लिए जमीन की कमी और गंभीर हो जाएगी।

आवश्यकता है कि नगर परिषद खोई हुई सरकारी जमीन की पहचान करे और उचित कानूनी कार्रवाई के माध्यम से उसे अतिक्रमणमुक्त कराए। इससे न केवल सरकारी जमीन को जनहित में उपयोग किया जा सकेगा, बल्कि शहर के विकास को भी गति मिलेगी। प्रशासन को इस दिशा में तत्काल और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। ताकि राजगीर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए इसके विकास को सुनिश्चित किया जा सके।

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