नालंदाफीचर्डराजगीरशिक्षा

भारत और चीन सांस्कृतिक सेतु के शिल्पी थे ह्वेनसांग, उस विरासत को आगे बढ़ाने का समय : शू वेई

नालंदा दर्पण डेस्क। भारत और चीन के बीच प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों की जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही प्रासंगिक वे आज के वैश्विक परिदृश्य में भी हैं। इसी ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करते हुए कोलकाता स्थित चीन के काउंसिल जनरल शू वेई ने कहा कि सातवीं शताब्दी के महान बौद्ध विद्वान ह्वेनसांग भारत-चीन संबंधों के वास्तविक अग्रदूत थे। उनका जीवन और कृतित्व आज भी पारस्परिक सम्मान, संवाद और सहयोग का मार्ग दिखाता है।

जनरल शू वेई ने नालंदा स्थित ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल के 19वें वार्षिकोत्सव समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए आगे कहा कि यह आयोजन केवल अतीत की स्मृति भर नहीं, बल्कि दोनों सभ्यताओं के बीच जीवंत संपर्क और साझी विरासत का प्रतीक है।

समारोह से पूर्व शू वेई ने ह्वेनसांग की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की तथा उनके यात्रा-वृतांत संग्रहालय, नवनिर्मित अस्थि संग्रहालय और सभागार का निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि ह्वेनसांग नालंदा में बौद्ध दर्शन के गहन अध्ययन के लिए आए थे और अनेक दुर्लभ भारतीय बौद्ध ग्रंथों को चीन ले जाकर उनका अनुवाद कराया। इन अनुवादों ने न केवल चीन, बल्कि पूरे एशिया में बौद्ध चिंतन और दर्शन के प्रसार में निर्णायक भूमिका निभाई।

काउंसिल जनरल ने ई-त्सिंग जैसे विद्वानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि इन आचार्यों ने भारत से बौद्ध ग्रंथों को चीन न पहुँचाया होता तो आज बौद्ध संस्कृति को उसके वर्तमान स्वरूप में समझना कठिन होता। 12वीं शताब्दी के आक्रमणों के बाद भी चीन में संरक्षित ग्रंथों ने बौद्ध साहित्य और परंपरा को जीवित रखा, जो दोनों देशों के गहरे शैक्षणिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण है।

उन्होंने यह भी बताया कि बीते दो हजार वर्षों में भारत और चीन ने बौद्ध धर्म, सिल्क रूट, कला और स्थापत्य के माध्यम से एक-दूसरे को समृद्ध किया है। वर्ष 2035 में भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ की ओर इशारा करते हुए शू वेई ने आशा जताई कि आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय सहयोग और जन-से-जन संपर्क और अधिक मजबूत होंगे।

उन्होंने यह जानकारी भी साझा की कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 155 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक पहुँच चुका है और इसमें निरंतर वृद्धि हो रही है।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत करते हुए डीन प्रो. विश्वजीत कुमार ने कहा कि यह दिवस ह्वेनसांग की ज्ञान, सत्य और सांस्कृतिक समन्वय की विरासत को स्मरण करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नालंदा प्राचीन एशिया का प्रमुख शिक्षा केंद्र रहा है और ह्वेनसांग को विश्व का प्रथम अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी माना जा सकता है, जिन्होंने हजारों मील की यात्रा कर यहाँ अध्ययन किया।

काउंसिल जनरल ने भविष्य की ओर देखते हुए हवाई संपर्क बढ़ाने, व्यापारिक समुदाय को अधिक सुविधाएँ देने तथा छात्र और पर्यटन आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का संचालन सुश्री अन्नी सिंह ने किया, जबकि समापन कुलसचिव प्रो. रूबी कुमारी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

समाचार स्रोत : मुकेश भारतीय / मीडिया रिपोर्ट्स

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (mukesh bhartiy) पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.