नालंदा दर्पण डेस्क। विश्व इतिहास के उन दुर्लभ और प्रेरक व्यक्तित्वों में चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग का नाम बतौर ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जिनका संपूर्ण जीवन मानवीय मूल्यों, करुणा और भगवान बुद्ध के उदात्त उपदेशों के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा। उनकी अतुलनीय ज्ञान-पिपासा, अदम्य साहस और आध्यात्मिक साधना ने न केवल भारत और चीन के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया, बल्कि समूचे एशिया में बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण को नई दिशा दी।
राजगीर और नालंदा की पावन भूमि से ह्वेनसांग का संबंध केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि आत्मिक और बौद्धिक भी रहा है। नालंदा महाविहार में वे छात्र भी रहे और आचार्य भी। यहीं उन्होंने बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र और विनय के नियमों का गहन अध्ययन किया तथा ज्ञान की उसी परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसने नालंदा को विश्व का प्राचीनतम विश्वविद्यालय बनाया। आज नालंदा में स्थित ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल (श्वेन् त्साङ् स्मृति भवन) उनकी इसी अमर विरासत का सजीव प्रतीक है।
भारत-चीन मैत्री की ऐतिहासिक नींवः ह्वेनसांग की स्मृति को स्थायी रूप देने की ऐतिहासिक पहल जनवरी 1957 में हुई थी, जब तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने ह्वेनसांग के अस्थि कलश, बौद्ध ग्रंथ और स्मृति भवन के निर्माण हेतु राशि एवं नक्शा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भेंट किया। यह पहल केवल एक सांस्कृतिक उपहार नहीं थी, बल्कि पंचशील सिद्धांतों पर आधारित भारत-चीन मैत्री की मजबूत नींव भी थी।
इस स्मृति भवन का निर्माण कार्य वर्ष 1980 में आरंभ होकर 1984 में पूर्ण हुआ, हालांकि उस समय आंतरिक कलात्मक कार्य अधूरा रह गया था। वर्ष 2001 में इसे नव नालंदा महाविहार को हस्तांतरित किया गया, जिसके बाद इसके व्यापक जीर्णोद्धार और विकास की योजना तैयार की गई। वर्षों के प्रयासों के बाद अब स्मृति भवन का पुनरुद्धार और आंतरिक सज्जा कार्य पूर्ण हो चुका है और यह अपने भव्य स्वरूप में नालंदा की पहचान बनकर खड़ा है।
अस्थि कलश की वापसी की उम्मीदः सुरक्षा के अभाव में ह्वेनसांग की अस्थि का कलश अब तक पटना संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था। अब ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल परिसर में अत्याधुनिक सुरक्षा व्यवस्था से युक्त अलग भवन तैयार कर लिया गया है, जिसमें बुलेट प्रूफ शीशे भी लगाए गए हैं। कागजी औपचारिकताएं पूरी होते ही यह ऐतिहासिक अस्थि कलश पुनः नालंदा लाए जाने की संभावना है, जिससे यह स्थल बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए और भी महत्वपूर्ण तीर्थ बन जाएगा।
ह्वेनसांग साधारण बालक से ‘बुद्ध का दूत’ तकः उप्लब्ध दस्तावेजों के अनुसार प्रव्रज्या से पूर्व ह्वेनसांग का बचपन का नाम ‘छनई’ था। मात्र 12 वर्ष की आयु में वे श्रामणेर बने और 21 वर्ष की उम्र में छेंगदू में उपसम्पदा ग्रहण कर भिक्षु बने। बचपन से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। कन्फ्यूशियस दर्शन के ज्ञाता होने के साथ-साथ बौद्ध दर्शन के प्रति उनकी जिज्ञासा उन्हें भारत की ओर खींच लाई।
सन् 629 ईस्वी में उन्होंने अकेले भारत की कठिन यात्रा आरंभ की। उनका उद्देश्य था कि भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थलों का दर्शन, धर्म के शुद्ध स्वरूप का अध्ययन और प्रमाणिक बौद्ध ग्रंथों का संग्रह। मरुस्थलों, पहाड़ों और असंख्य संकटों को पार करते हुए वे भारत पहुँचे। नालंदा महाविहार में पाँच वर्षों तक अध्ययन करने के बाद उन्होंने एक वर्ष तक अध्यापन भी किया।
अपने प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत ‘छाङ् राजवंश से पश्चिम की यात्रा’ में उन्होंने भारत के सामाजिक, धार्मिक और भौगोलिक जीवन का प्रामाणिक वर्णन किया। इसी ग्रंथ के आधार पर प्राचीन नालंदा महाविहार के भग्नावशेषों की पहचान और उत्खनन संभव हो सका। भारत प्रवास के बाद जब वे चीन लौटे तो अपने साथ 657 बौद्ध ग्रंथ और अनेक बुद्ध प्रतिमाएं लेकर गए। शेष जीवन उन्होंने इन ग्रंथों के अनुवाद और बौद्ध साहित्य को समृद्ध करने में समर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें एशिया भर में ‘भगवान बुद्ध का दूत’ कहा जाता है।
आज भी नालंदा का ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल अब न केवल अतीत की गौरवगाथा सुनाता है, बल्कि वर्तमान और भविष्य में भारत-चीन मैत्री तथा सांस्कृतिक एकता का सशक्त प्रतीक बनकर उभर रहा है।
समाचार स्रोत : मुकेश भातीय / मीडिया रिपोर्ट्स













