बधाई हो… बधाई… सुशासन के घर भी खिल गया वंशवाद का कमल!
“निशांत कुमार की मंत्री पद पर ताजपोशी के बाद बिहार की राजनीति में उठे सवाल कि क्या वंशवाद अब आधिकारिक नीति बन चुका है….?
नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा गूंज रहा है- बधाई हो… वंशवाद… बधाई हो…। फर्क बस इतना है कि इस बार बधाई किसी विकास योजना, रोजगार अभियान या शिक्षा सुधार की नहीं, बल्कि सत्ता के नए वंश विस्तार की दी जा रही है।
जिस राजनीति ने दशकों तक परिवारवाद को लोकतंत्र का कैंसर बताया, उसी राजनीति के आंगन में अब वंशवाद का पौधा नहीं, पूरा बरगद रोपा जा चुका है। और इस ऐतिहासिक पौधारोपण के मुख्य पात्र बने हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार, जिन्हें अचानक सत्ता के गलियारे में ऐसी एंट्री मिली कि पुराने जदयू नेता भी अपना बायोडाटा लेकर कोने में खड़े रह गए।
कहा जा रहा है कि महज दो दिन की सद्भाव यात्रा ने निशांत जी को ऐसा राजनीतिक ज्ञान दे दिया कि उन्हें लगा कि जनता के बीच घूमने से ज्यादा आध्यात्मिक सुख तो सीधे मंत्री बंगले में मिलता है। सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहट है कि बेटा अब तक राजनीति से दूर था, लेकिन कुर्सी इतनी प्यारी चीज है कि विरक्ति भी वैराग्य त्याग देती है।
राजनीतिक व्यंग्य यही कह रहा है कि जो लोग वर्षों तक परिवारवाद हटाओ का शंख बजाते रहे, उन्होंने अंततः अपने ही घर में सत्ता का उत्तराधिकारी खोज लिया। फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी दलों में इसे वंशवाद कहा जाता था और यहां इसे नेतृत्व संक्रमण नाम दिया जा रहा है।
जदयू के अंदरूनी हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी को डर है कि अगर अभी उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया गया तो बाद में पार्टी का राजनीतिक श्राद्ध करना पड़ सकता है। इसलिए संगठन से ज्यादा जरूरी समझा गया कि परिवार सुरक्षित रहे।
राजनीति के पुराने खिलाड़ी चुटकी ले रहे हैं कि जदयू अब विचारधारा से नहीं, पारिवारिक वारिस खोज अभियान से चल रही है।
निशांत कुमार के समर्थक अब उनके पूर्वजों का संबंध उस पावन अयोध्या से जोड़ने लगे हैं, जहां भगवान राम ने राजधर्म के लिए सीता का त्याग किया था। मगर विरोधियों का तर्क है कि रामायण का असली संदेश सत्ता त्याग था, सत्ता हस्तांतरण नहीं।
व्यंग्यकारों का कहना है कि लव-कुश ने पिता का सिंहासन नहीं लिया था, लेकिन आधुनिक राजनीति में सिंहासन ऐसा मोह है कि विरासत बचाने के लिए विचारधारा तक गिरवी रख दी जाती है। बिहार के गांव-देहात में लोग मजाक में कह रहे हैं कि अब लोकतंत्र में वोट जनता देगी, लेकिन मुख्यमंत्री परिवार तय करेगा।
राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इतनी जल्दी क्या थी? क्या जदयू को अब अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं रहा? क्या पार्टी में ऐसा कोई चेहरा नहीं बचा, जिसे जनता का नेता कहा जा सके?
कुछ वरिष्ठ जदयू नेता ऑफ द रिकॉर्ड कहते हैं कि पार्टी के अंदर हर कोई जानता है कि निशांत राजनीति की स्वाभाविक पसंद नहीं हैं। वे खुद कई बार आध्यात्म और निजी जीवन में रुचि की बात कर चुके हैं। लेकिन सत्ता का गणित ऐसा है कि संन्यास भी आखिरकार मंत्रिपद में बदल गया।
एक पुराने समाजवादी नेता ने तंज कसा कि जिन्हें बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड संभालना चाहिए था, उन्हें स्वास्थ्य विभाग पकड़ा दिया गया। अब मरीज राम भरोसे और राजनीति परिवार भरोसे।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि पार्टी में कोई खुलकर विरोध नहीं कर रहा। कारण साफ है कि जो बोलेगा, वो राजनीतिक वनवास में भेज दिया जाएगा। इसलिए नेता मुस्कुरा रहे हैं, मिठाई बांट रहे हैं और कैमरे पर कह रहे हैं कि यह ऐतिहासिक फैसला है।
अंदरखाने कई नेता इसे जदयू का अंतिम अध्याय भी बता रहे हैं। उनका मानना है कि पार्टी अब विचारधारा आधारित संगठन नहीं, बल्कि भावनात्मक पारिवारिक लिमिटेड कंपनी बनती जा रही है।
उधर बिहार की सत्ता में दूसरे ध्रुव माने जा रहे सम्राट चौधरी को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि असली नियंत्रण अब धीरे-धीरे दिल्ली के हाथों में जा रहा है और पटना केवल औपचारिक राजधानी बनकर रह जाएगा।
पत्रकारों और सत्ता समर्थकों की एक जमात अब भी यह मानने को तैयार नहीं कि बिहार की राजनीति तेजी से बदल चुकी है। लेकिन सत्ता के समीकरण बता रहे हैं कि आने वाले दिनों में कई बड़े प्रतीकात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। शहरों के नाम से लेकर सत्ता की शैली तक।
लोग कह रहे हैं कि लोकतंत्र अब जनता का कम और परिवारों का ज्यादा उत्सव बनता जा रहा है। क्या निशांत कुमार का मंत्री बनना जदयू में नई पीढ़ी का आगमन है? या फिर यह वही पुराना भारतीय राजनीतिक मॉडल है कि पिता के बाद पुत्र?
क्या बिहार की राजनीति अब पूरी तरह व्यक्तित्व आधारित हो चुकी है? क्या विचारधारा केवल भाषणों तक सीमित रह गई है? फिलहाल इतना तय है कि बिहार में “वंशवाद” अब विरोध का मुद्दा कम और राजनीतिक आवश्यकता ज्यादा बन चुका है।
तो एक बार फिर बधाई हो… बधाई हो… बिहार में लोकतंत्र स्वस्थ हो न हो, लेकिन वंशवाद का स्वास्थ्य फिलहाल बिल्कुल फिट, मोटा-ताज़ा और चमकदार दिख रहा है।






